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Saturday, December 10, 2011

जीवन से कैसे जुड़ा शास्त्रीय संगीत ...!!

शास्त्र में उस स्वर सन्दर्भ को राग का नाम दिया गया है जो मधुर स्वर और वर्ण से विभूषित होकर ह्रदय का रंजन करे| किसी एक स्वर से मन रंजित  नहीं होता |जब तक अन्य स्वरों का सहयोग न हो ..तब तक उसमे भाव या ..रस की उत्पत्ति नहीं होती |जब अनेक सुर मिलकर किसी धुन में बंध जाते हैं ,या किसी एक राह पर चलते हैं ...तो वह धुन राग का संचार करने में समर्थ होती है |उसी धुन को राग कहते है |अब हम राग को ''चुने हुए सुरों की रंगोली बनाते हुए किसी राह पर चलना ''...इस तरह की कल्पना भी दे सकते हैं|

राग में निम्नलिखित बातों का होना ज़रूरी है ...
१-राग किसी ठाट से उत्पन्न होनी चाहिए |
२-ध्वनी  की एक विशेष रचना हो |
३-उसमे स्वर तथा वर्ण हों
४-रंजकता यानि सुन्दरता हो |
५-राग में कम से कम पञ्च स्वर आवश्य होने चाहिए |
६- राग में एक ही स्वर के पास-पास उपयोग को शास्त्रकारों ने विरोध किया है |जैसे  ग और ग ,
७- राग में आरोह-अवरोह होना आवश्यक है |क्योंकि उसके बिना राग को पहचाना नहीं जा सकता |
८-किसी भी राग से षडज स्वर वर्जित नहीं होता |
९-मध्यम और पंचम दोनों एक साथ कभी वर्जित नहीं होते |एक न एक स्वर राग में होगा ही |
१०-राग में वादी-संवादी स्वर ज़रूर होना चाहिए |

अब साधारण भाषा में ये कहा जा सकता है कि बहुत सरे नियम को मानते हुए जब हम स्वरों का प्रयोग करते हैं ,तो राग कि उत्पत्ति होती है | तब ही बनती है ऐसी रचना जो मन रंजित करे |बिना कुछ नियम निभाए ,या बिना कुछ बंधन में बंधे ........बिना अथक प्रयास के ....राग की संरचना  नहीं होती ...!!


इसलिए कहते हैं  जीवन से जुड़ी बहुत सारी बातें शास्त्रीय संगीत बताता है ..!और  हमें  अपनी  सभ्यता  और  संस्कृति  से  जोड़े  रखता  है  ...!


*षडज-सा  स्वर को संगीत की भाषा में षडज कहते हैं .
रिशब- रे
गंधार -ग
मध्यम -म
पंचम -प
धैवत -ध
निषाद -नि 

Saturday, December 3, 2011

अलंकार ...

प्राचीन ग्रंथकार 'अलंकार 'की परिभाषा इस प्रकार कहते हैं :

  
 विशिष्ट वर्ण सन्दर्भमलंकर प्रचक्षते


अर्थात-कुछ नियमित वर्ण समुदाओं को अलंकार कहते हैं |
अलंकार का शाब्दिक अर्थ हुआ  सजाना या शोभा बढ़ाना |तो अलंकार हुआ आभूषण या गहना |जिस प्रकार आभूषण से शरीर की शोभा बढ़ती है ...उसी प्रकार अलंकार से गायन  की शोभा बढ़ती है |


जैसे चन्द्रमा के बिना रात्री ,जल के बिना नदी,फूल के बिना लता तथा आभूषण के बिना स्त्री शोभा नहीं पाती ,उसी प्रकार अलंकार बिना गीत भी शोभा को प्राप्त नहीं होते  |
                    अलंकार को पलटा भी कहते हैं |गायन सीखने से पहले विद्यार्थियों को विभिन्न अलंकार सिखाये जाते है |इससे स्वर ज्ञान अच्छा होता है |राग-विस्तार में सहायता मिलती  है |इनकी सहायता से अपनी कल्पनाशक्ति से आप राग जैसा चाहें सजा सकते हैं |ताने भी अलंकारों के आधार पर ही बनती हैं|

स्वर स्थान समझने के लिए ..या यूँ कहूं की ये जानने के लिए की सा से रे ,रे से ग ,ग से म क्रमशः स्वरों की दूरी परस्पर कितनी है हमें अलंकारों का अभ्यास करना पड़ता है |जैसे :
आरोह :सारेग ,रेगम ,गमप,मपध ,पधनी ,धनिसां ||
अवरोह :सांनिध ,निधप,धपम ,पमग ,मगरे ,गरेसा ||
स्वरों से समूह को ले कर आरोह और अवरोह करते हैं विभिन्न अलंकार |
ये कई प्रकार से किये जा सकते हैं |



                                          अलंकार वर्ण समुदायों में ही होते हैं|उदाहरण के लिए वर्ण समुदाय को लीजिये ...सा रे  ग  सा |इसमें आरोही-अवरोही दोनों वर्ग आ गए हैं|यह एक सीढ़ी मान लीजिये|अब इसी आधार पर आगे बढिए ...और पिछला स्वर छोड़कर आगे का स्वर बढ़ाते जाइए |रे  ग  म  रे ..ये दूसरी सीढ़ी हुई ...


सा   रे   ग   सा ,
      रे   ग  म   रे ,
         ग  म  प  ग  ,
            म   प  ध   म  ,
              प   ध नि  प,
                ध  नि  सा ध
                   नि  सां   रें  नि ,
                     सां   रें  गं सां


अवरोह ...में वापस आना है |
                                                     सां   रें  गं सां
                                                नि  सां   रें  नि ,  
                                            ध  नि  सा ध .....


इस प्रकार ...!


इसी प्रकार बहुत से अलंकार तैयार किये जा सकते है |राग में लगने वाले स्वरों के आधार पर |अलंकार क्या है ये समझाने कीमैंने  पूरी कोशिश की है ...पता नहीं किस हद तक समझा पाई हूँ क्योंकि ये क्रियात्मक शास्त्र है |पहले हम खूब गा कर मन में स्वरों को  बिठाते हैं ...रट-रट कर ...बाद में शास्त्र कुछ समझ में आता है |
                                               अगर कुछ प्रश्न हो ज़रूर पूछ लीजिये ...मेरा सौभाग्य होगा अगर मैं कुछ बता पाऊं ...!

Sunday, November 20, 2011

संधि प्रकाश राग से प्रकाशित ..गुंजित...धरा ....!!

संधि प्रकाश  राग क्या हैं ...?


स्पंदन ...जीवन ...और संगीत ...एक चोटी  की तरह गुंथे हुए हैं...!जब से मनुष्य का जीवन है तभी से ही संगीत का अधिपत्य इस धरा पर है ...!जन-जन के हृदय  में बसा लोक-संगीत ...जन्म पर गाये  जाने वाले सोहर से लेकर मृत्यु पर राम नाम सत्य का जाप ....संगीत से कुछ भी तो अछूता नहीं है .....!!किसी श्राप से श्रपित हो हम उसे अपने हृदय  से दूर कर देते हैं किन्तु इतिहास गवाह है इस बात का ...जहाँ संगीत है वहां खुशहाली हमेशा रहती है ...!!और जहाँ खुशहाली है वहां संगीत का दर्जा बहुत ऊपर रहता है ...!!दोनों ही बातें हैं |
                   साधक को यह बात ध्यान देना है कि स्वरों का आन्दोलन किस प्रकार हो कि ह्रदय के आन्दोलन को छू जाये |एक सफल संगीतज्ञ का कार्य ही यही है |कला में अपनी बात मनवाने की ताक़त होती है अगर उसे साधना की तरह लिया जाये ...!मैंने पहले चर्चा कि है कि समय के आधार पर रागों का वर्गीकरण हुआ है |अब पूरे चौबीस घंटों में दो बार ऐसा होता है कि अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है |या दोनों कि संधि होती है ........एक बार अन्धकार प्रकाश में विलीन हो जाता है और एक बार प्रकाश अपना तेज त्याग ...अन्धकार में घुप्प हो.. सो जाता है ...!!शायद जीवन  चक्र से पराजित ...या ...कर्तव्य बोध से बंधा ...कि कुछ क्षण नींद ज़रूरी है ...!तो...इन दोनों समय को संगीत कि भाषा में संधिप्रकाश काल कहते हैं |और इस समय गाए जाने वाले राग संधिप्रकाश राग कहलाये जाते हैं |ये संधिप्रकाश राग दो तरह के होते :


1-प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग
2-सांयकालीन  संधिप्रकाश राग


प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग गायन का समय प्रातः चार से सात बजे का है |भैरव,तोड़ी ,उसके सभी प्रकार और रामकली इस समय के राग हैं |


सांयकालीन संधिप्रकाश राग में पूरिया ,मारवा ,पूरिया धनाश्री आदि आते हैं |


इनको किस प्रकार लिया जाता है इसी चर्चा अगले अंक में ....

Thursday, November 10, 2011

संगीत में मध्यम स्वर का महत्व ..!!

भारतीय संगीत के सात स्वरों में से मध्यम स्वर बड़े महत्व का है |इस स्वर के प्रयोग से हमें यह मालूम पड़ता है कि अमुक राग का गायन समय दिन है या रात्री |संगीत के शास्त्रकारों ने चौबीस घंटों के समय को दो बराबर भागों में विभाजित किया है |प्रथम भाग को पूर्वार्ध कहा  ,जिसका  गायन समय रात्री के बारह बजे से दिन के बारह बजे माना अर्थात A.M में |दूसरे भाग को उत्तरार्ध कहा जिसका गायन समय दिन  के बारह बजे से रात्री  के बारह बजे तक माना अर्थात P.M में |
दिन के पहले भाग में शुद्ध म की और दूसरे भाग में तीव्र म की प्रधानता मानी गयी है |


उदाहरण:1-भैरव व बहार लीजिये |इन दोनों रागों में शुद्ध मध्यम का प्रयोग होता है तो ये अनुमान लगाया जा सकता है किये राग  दिन के पूर्वार्ध में  ,अर्थात रात्री के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक गाये-बजाये जाते हैं |


2-यमन में तीव्र मध्यम का प्रयोग है इसलिए ये राग उत्तरार्ध में यानी रात के प्रथम प्रहर में गाया बजाया जाता है |


इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं |तोड़ी ,हिंडोल,भीमपलासी दुर्गा,देश,बागेश्वरी आदि इस नियम का खंडन करते हैं |
इस नियम का पालन संधिप्रकाश रागों में निश्चित रूप से होता है


संधिप्रकाश राग क्या है इसकी चर्च अगली पोस्ट   में करेंगे ....                     


                                                                                                क्रमशः ...

Sunday, November 6, 2011

कठिनाईयों से लड़ता ...शास्त्रीय संगीत का जीवन ....!!

 एक जादू की तरह कार्य करता है शास्त्रीय संगीत|जोड़ देता है मन के कोमल तारों को प्रभु से |देता है एक ऐसा नशा जो चढ़ जाए तो कभी उतरता ही नहीं है |किन्तु उस राह पर चलना ....संगीत से जुड़े रहना ....बहुत आसान नहीं है |एक तरह का योग है ....एक साधना है ...!!कम से कम १०-१२ वर्ष तक संगीत लगातार सीखने के बाद कुछ समझ में आती  है इसकी भाषा |मेरी समझ से छोटे बच्चों के लिए संगीत की शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिए|जो लोग बचपन से ही इस विधा से जुड़े रहते हैं वे बहुत खुशकिस्मत होते हैं क्योंकि उनके दिमाग की कल्पनाशक्ति बहुत बढ़ जाती है और याददाश्त भी तेज़ हो जाती है |आजकल जिसे हम  ''multitasking '' कहते हैं वो संगीत की साधना से आसान हो जाता है |इस व्यस्त जीवन में ,आपाधापी में, एक रूचि का होना अनिवार्य है जो आपको हमेशा सकारात्मक उर्जा देती रहे |आजकल ''life is on a fast track'' इसलिए संगीत की साधना की ओर किसी का ध्यान  नहीं जाता|सभी को लगता है थोड़ा सा सीख कर कैसे जल्दी-जल्दी टी.वी पर आया जाये |कला का ज्ञान लेना कम  लोग चाहते  हैं | आज इन्हीं धूमिल होती हुई परम्पराओं को जीवित रखने की आवश्यकता है |गागर भरने के बाद छलकने ही लगती है ....!!पर धैर्य से हमें गागर भरने का इंतज़ार करना होता है |घरों घर शास्त्रीय संगीत का दीप प्रज्ज्वलित हो यही कोशिश  है ...!!

Tuesday, September 20, 2011

राग यमन .....सरगम गीत का अन्तरा.....

पीत  कमल ..
राग यमन
 ठाट :कल्याण              
जाती :सम्पूर्ण            
समय :रात्री का प्रथम प्रहर 
वादी :ग(गंधार)           
संवादी:नि (निषाद)





आरोह:   नि रे ग प धनि सां
अवरोह:  सां नि ध प ग रे सा 

सरगम गीत का अन्तरा दे रही हूँ .....कोशिश करूंगी इसे पोडकास्ट भी कर सकूँ ...किन्तु उसके लिए थोडा और वक़्त लगेगा ...
अन्तरा.....

   ग     प   सां   $    सां    $   सां    रें   गं   रें   सां   नि  ध   प 
गं   रें   सां   नि   ध  प   नि    ध   प       ग    रे   ग    रे   सा   $
नि  रे   ग       प   ध  नि   सां   रें    नि  ध   प      प   ग   म 


कृपया पढ़ते रहें ...और अभ्यास जारी  रखें.......

Sunday, September 11, 2011

राग यमन ....वादी -संवादी .....

श्वेत कमल...
राग यमन
 ठाट :कल्याण              
जाती :सम्पूर्ण            
समय :रात्री का प्रथम प्रहर 
वादी :ग(गंधार)           
संवादी:नि (निषाद)







आरोह:   नि रे ग प धनि सां
अवरोह:  सां नि ध प ग रे सा 

राग  यमन  की  चर्चा  चल  रही  है  ...!!
    इसका  वादी  ग  और  संवादी  नि  है |आज  मैं  आपको  बताती  हूँ  वादी   ,संवादी क्या  होता  है ...
 वादी मतलब  मुख्य  स्वर  ..
   राग  विस्तार :नि  रे ग$$ ,रे ग$$ , $ ग$$ , पम  ग रे ग$$$$,नि रे सा $$$
          यहाँ आप  देख  रहे  होंगे  दूसरे  स्वर  लेने  के  बाद  ग पर  आकर  हम  थोड़ा  रुकते  हैं  ... और स्वरों की अपेक्षा ग बार बार भी आ रहा है और वहां पर ठहराव भी है इसलिए  ये  राग का  वादी  स्वर है .
       ठीक  इसी  प्रकार  नि राग में  ग से  कम  उपयोग  में आता  है तो  वो  संवादी  स्वर कहलाता  है |
     यह यमन की  स्वर  मालिका  है  ....16 मात्र  ताल  - तीनताल में   निबद्ध.........
      स्थाई  ...
  नि   ध  -  प   म   प  ग  म    प -   -  -     प    ग  रे 
  सा   रे  ग  रे  ग     प   ध   प     ग   रे  ग   रे सा -
  नि   रे  ग  म  प  ध   नि  सां रे सां नि ध  प  म   ग  म 

अन्तरा अगले  भाग  में  ...स्थाई  समझने   के  बाद .....



     जब  हम  कार  चलाना  सीखते  हैं  ..बड़े  ध्यान  से  पहले  पहला  गेयर  ....फिर  दूसरा  ...फिर तीसरा  ...चौथे  गेयर में  चलने  के  लिए  धैर्य  चाहिए  न  ...? वैसे ही संगीत समझने के लिए धैर्य की आवश्यकता है ...अपना धैर्य खोएं नहीं इसे पढ़ते रहें .....!!
आभार.

Monday, September 5, 2011

राग यमन और राग की जाती ...

अरुण  कमल 
  राग यमन
 ठाट :कल्याण              
जाती :सम्पूर्ण            
समय :रात्री का प्रथम प्रहर 
वादी :ग(गंधार)           
संवादी:नि (निषाद)







आरोह:   नि रे ग प धनि सां
अवरोह:  सां नि ध प ग रे सा

राग कल्याण की हम चर्चा कर रहे थे|इसमें तीव्र मध्यम का प्रयोग किया जाता है|कई बार पंचम और षडज  वर्जित करके गंधार और निषाद का महत्व राग की  विशेषता के रूप में दिखाया जाता है |यही सच्चा यमन है |
 जैसे  शुरुआत  में  ....नि रेग ,  ...धनिसां   ..
          यहाँ  ये  भी  बताना  चाहूंगी  की  प्रत्येक  राग  में जो   मुख्य   स्वर  होता  है  वो  -वादी   और  दूसरा  मुख्य स्वर -संवादी कहलाता  है  |यमन में ग-वादी  है और नि-संवादी  है |
             आज यमन की ही  चर्चा करते  करते मैं  ये  भी  बताना  चाहूंगी  की किसी  भी राग को  गाने  के लिए  कम  से  कम पांच   स्वरों  का होना  आवश्यक  है |इसी  के  आधार  पर  हम  राग  की  जाती  निश्चित  करते  हैं  |सातों   स्वर  लगाने  पर सम्पूर्ण   जाती....छः  स्वर लगाने पर षाडव  जाती  और  पांच  स्वर लगाने पर औडव  जाती हो  जाती  है  |तो  राग की जाती तीन  हुईं  :
1-संपूर्ण 
 2-षाडव
 3-औडव
 आरोह -अवरोह  देखते  हुए  अब  कुल  नों  जातियां  बनातीं  हैं:
  1-संपूर्ण-संपूर्ण
  2-संपूर्ण-षाडव
  3-संपूर्ण-औडव
  4-षाडव-संपूर्ण
  5-षाडव-षाडव
  6-षाडव-औडव
  7-औडव- संपूर्ण
  8-औडव-षाडव
  9-औडव-औडव
              ये राग के बारे  में  बहुत  मूलभूत  बातें  हैं इन्हें  समझाना  बहुत ज़रूरी   है  |अब  आप   समझ  ही  गए  होंगे  की  राग यमन   या  कल्याण  सम्पूर्ण जाती का  राग है |इसमें  सातों  स्वरों  का प्रयोग  किया  जाता  है |

Sunday, September 4, 2011

स्वरोज सुर मंदिर (4)राग और थाट में अंतर ....

अरुण कमल
 स्वरोज सुर  मंदिर की चौथी कड़ी प्रस्तुत है ..!!
सबसे पहले आभार आप सभी का इस श्रंखला में रूचि लेने हेतु ..!
मनोज जी आपने प्रश्न  पूछा था की राग और थाट में क्या अंतर है ..?
आज यहीं से इस आलेख की शुरुआत करती हूँ |आधुनिक काल में यह पद्धति थाट -राग वर्गीकरण के नाम से प्रचलन में आई |जैसा की मैंने आपको बताया था संपूर्ण रगों को ,उनके स्वर प्रयोग के आधार पर ,दस थाटों में विभाजित किया गया है |फिलहाल हम कल्याण थाट की बात कर रहें हैं |कल्याण थाट में कई राग आते हैं ..जैसे -भूपाली,कल्याण,छायानट,केदार,कामोद,गौड़ सारंग,हमीर ...इत्यादि |अब इन्हीं सब रागों से राग कल्याण पर हमने थाट का नाम भी कल्याण कर दिया |तो कल्याण थाट भी है और राग भी |अब भूपाली को लीजिये ...उसका वर्णन करते समय हम कहेंगे थाट- कल्याण ..राग -भूपाली ...|
इस प्रकार हर थाट में कोई एक ऐसा राग होता है जो राग भी है और थाट भी |फिर आगे मैं आपको बताउंगी कि हर थाट में कुछ स्वर संगतियाँ समान होती हैं |हर थाट कि कुछ विशेष बातें होतीं हैं जो उसके अंतर्गत आने वाली हर राग में झलकती है|
थाट कल्याण की मुख्य  विशेषता है तीव्र मध्यम का प्रयोग....!!
यहाँ मैं आपको पुराना लिंक भी दे रहीं हूँ उसको पढ़ने से भी थाट के बारे में समझ और बढ़ सकेगी ...!!
आगली कड़ी में हम चर्चा करेंगे कल्याण थाट की कुछ अन्य विशेषताओं के बारे में ...!!
आपके सुझाव और कुछ अन्य प्रश्न भी आमंत्रित  हैं ....!!

स्वरोज सुर मंदिर (3) क्रमशः...

ये भी पढ़ें ... परिकल्पना पर ..कुछ उनकी कुछ इनकी...
आभार..


स्वरोज सुर मंदिर (3)ठाट ,आहत नाद अनाहत नाद

 स्वरोज सुर  मंदिर की तीसरी कड़ी प्रस्तुत है ..!!
नील कमल.

नाद ब्रम्ह.....परब्रम्ह ...!!
प्रभु तक पहुँचाने का एक मार्ग  संगीत भी है  नाद के विषय में कुछ रोचक जानकारी से आज की चर्चा प्रारंभ करते हैं |आज नाद के गुण और उसके प्रकार के विषय में चर्चा करते हैं 
नाद के दो प्रकार होते हैं :
  1. आहत नाद 
  2.  अनाहत नाद .
ये दोनों ही पिंड (देह)से प्रकट होते हैं ,इसलिए पिंड का वर्णन किया जाता है |

आहत नाद :जो कानो को सुनाई देता है और जो दो वस्तुओं के रगड़ या संघर्ष से पैदा होता है उसे आहत नाद कहते हैं |इस नाद का संगीत से विशेष सम्बन्ध है |यद्यपि अनाहत नाद को मुक्तिदाता मन गया है किन्तु आहात नाद को भी भाव सागर से पार लगानेवाला बताया गया है |इसी नाद के द्वारा सूर,मीरा इत्यादि ने प्रभु-सानिध्य प्राप्त किया था और फिर अनाहत की उपासना से मुक्ति प्राप्त की ...!

अनाहत नाद ::जो नाद केवल अनुभव से जाना जाता है और जिसके उत्पन्न होने का कोई खास कारन न हो ,यानि जो बिना संघर्ष के स्वयंभू रूप से उत्पन्न होता है ,उसे अनाहत नाद कहते हैं ;जैसे दोनों कान जोर से बंद अनुभव करके देखा जाये ,तो 'साँय-साँय ' की आवाज़ सुनाई देती है
इसके बाद नादोपसना की विधि से गहरे ध्यान की अवस्था में पहुँचने पर सूक्ष्म नाद सुनाई पड़ने लगता है जो मेघ गर्जन या वंशिस्वर आदि से सदृश होता है |इसी अनाहत नाद की उपासना हमारे प्राचीन ऋषि -मुनि करते थे |यह नाद मुक्ति दायक तो है ...किन्तु रक्तिदायक नहीं |इसलिए ये संगीतोपयोगी भी नहीं है ,अर्थात संगीत से अनाहत नाद का कोई सम्बन्ध नहीं है |
  
    वास्तव में ध्वनि  का वर्गीकरण वैज्ञानिक ढंग से तीन गुणों के अधर पर किया जा सकता है :
  1. तारता अर्थात नाद का ऊँचा -नीचपन (Pitch.)
  2.  तीव्रता या प्रबलता अथवा नाद का छोटा बड़ापन (Loudness)
  3.   गुण या प्रकार (Timbre)  
चलिए  अब  लौट  चलते  हैं  राग  यमन  पर  |आपको आज राग यमन की विस्तृत जानकारी देती हूँ|
                                   राग यमन
 ठाट :कल्याण             जाती :सम्पूर्ण           समय :रात्री का प्रथम प्रहार 
वादी :ग(गंधार)           संवादी:नि (निषाद)


आरोह:   नि रे ग प धनि सां
अवरोह:  सां नि ध प ग रे सा
मध्यकालीन ग्रंथों में यमन का उल्लेख मिलाता है |परन्तु प्राचीन ग्रंथों में केवल कल्याण राग दिखाई देता है यमन नहीं |आधुनिक ग्रंथों में यमन एक सम्पूर्ण जाती का राग माना गया है |
राग का अध्ययन करते करते ही अब आपको राग वर्णन में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न सब्दों की जानकारी देती हूँ सबसे पहले देखें ठाट क्या है ...?
ठाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे राग उत्पन्न हो सके | पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम काल में 'राग तरंगिणी ' के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परंपरागत 'ग्राम और मूर्छना -प्रणाली' का परिमार्जन करके मेल अथवा ठाट को सामने रखा |उस समय तक लोचन कवि के अनुसार सोलह हज़ार राग थे ,जिन्हें गोपियाँ कृष्ण के सामने गया करती थीं;किन्तु उनमे से छत्तीस राग प्रसिद्द थे |सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अंतर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचार में आ गया,जो उस समय के प्रसिद्द ग्रन्थ 'संगीत -पारिजात'और 'राग विबोध'में स्पष्ट है |इस प्रकार लोचन कवी से आरंभ होकर यह ठाट पद्धति चक्कर काटती हुई श्री भातखंडे जी के समय में आकर वैधानिक रूप से स्थिर हो गई |
रागों का अध्ययन करने के हिसाब से सात स्वरों के प्रयोग के आधार पर ठाट का निर्माण किया गया |इस प्रकार हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुसार अब हम भातखंडे जी द्वारा बताये गए दस ठाट मानते हैं |जो इस प्रकार हैं:
बिलावल ठाट :               सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (सभी स्वर शुद्ध प्रयोग)
यमन या कल्याण ठाट : सा रे  ग  म  प  ध  नी  सां   |  (म तीव्र )
खमाज ठाट :                 सा  रे  ग  म  प  ध  नी सां  |  (नी कोमल)
 भैरव ठाट :                    सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  ध  कोमल )
पूर्वी ठाट :                      सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  ध  कोमल  म तीव्र  )
मारवा  ठाट :                  सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  कोमल  म  तीव्र  )
काफी ठाट :                    सा  रे    म  प  ध  नी  सां  |  (ग  नी  कोमल)
असावरी ठाट :                सा रे  म  प   नी  सां   |  (ग  ध  नी  कोमल  )
भैरवीं ठाट :                     सा  रे म  प   नी  सां  |   (रे ग ध नी कोमल )तोड़ी ठाट :
                   सा  रे      प    नी  सां  |  (रे  ग  ध  नी  कोमल  म  तीव्र )

अब आप ये बात समझ सकेंगे कि राग यमन कल्याण ठाट का राग है क्योंकि उसमे म  तीव्र प्रयोग होता है |
आज के लिए इतना बहुत है ... कोई बात समझ न आई हो तो कृपया निसंकोच पूछ लें ...फिर शीघ्र  मिलेंगे ...
क्रमशः ........

स्वरोज सुर मंदिर (२).....स्वर ,आरोह-अवरोह

अरुण कमल ..

आज स्वरोज सुर मंदिर की  दूसरी कड़ी लिख रही हूँ |राग यमन का परिचय आपको दिया था |राग यमन सुनते जाइये |आज कुछ मूलभूत बातें आपको बताती हूँ |

सबसे पहले स्वर क्या है ?

नियमित आन्दोलन -संख्या  वाली ध्वनी स्वर कहलाती  है|यही ध्वनी संगीत के काम आती है ,जो कानो को मधुर लगती है तथा चित्त को प्रसन्न करती है |इस ध्वनी  को संगीत की भाषा में नाद कहते हैं |इस आधार पर संगीतोपयोगी नाद 'स्वर'कहलाता है अब आप समझ  गए होंगे कि संगीत के स्वर और कोलाहल में फर्क है |और यहाँ संगीत विज्ञान से जुड़ गया है |संगीत में सातों स्वरों के नाम इस प्रकार हैं ....

सा-षडज
रे-रिशब
ग-गंधार 
म-मध्यम
प-पंचम 
ध-धैवत 
नि-निषाद


अब हम आरोह- अवरोह पर आते हैं |जब हम स्वरों को गाते हैं तो स्वरों के चढ़ते हुए क्रम को आरोह कहते हैं  | जैसे :
आरोह :सा ,रे, ग,म,,प ,ध,नि ,सं||
उसी तरह उतरते हुए क्रम को अवरोह कहते हैं |जैसे :
अवरोह :सां,नि ,ध ,प,म ,ग ,रे ,सा ||


अलंकार: स्वर स्थान समझने के लिए ..या यूँ कहूं की ये जानने के लिए की सा से रे ,रे से ग ,ग से म क्रमशः स्वरों की दूरी परस्पर कितनी है हमें अलंकारों का अभ्यास करना पड़ता है |जैसे :
आरोह :सारेग ,रेगम ,गमप,मपध ,पधनी ,धनिसां ||
अवरोह :सांनिध ,निधप,धपम ,पमग ,मगरे ,गरेसा ||
स्वरों से समूह को ले कर आरोह और अवरोह करते हैं विभिन्न अलंकार |
ये कई प्रकार से किये जा सकते हैं |




संगीत का प्रभाव :


संगीत से केवल आनंदानुभूति ही नहीं होती |ध्वनियाँ मानसिक स्थितियों की भी सूचक होती हैं |साथ ही ये हमारे मनोभावों को भी प्रभावित करतीं हैं |संगीत हमारी आत्मा में भक्तिमय अनुभूतियाँ भर देता है |भक्ति भी एक प्रकार का आवेग है जो हमारी आत्मा को प्रभावित करता है |
                  संगीत में एक गति है |और हमारी क्रियाएं भी गत्यात्मक हातीं हैं |दोनों में सदृश्य होने के कारण ही मात्र ध्वनिमय राग -रागिनियाँ हमारी आत्मा को प्रभावित कर लेती हैं |जो संगीत हम आत्मसात कर लेते हैं वो ईश्वरीय बन कर सदा सदा ...हमारे पास ..हमारे साथ ही रहता है|प्राकृतिक  गति हमें आनंद देती है |बच्चे जन्म से ही इससे प्रभावित हो जाते हैं |राग और लय में  प्रभावित  करने की शक्ति उनकी नियमितता के कारण ही आती है ,क्योंकि असंतुलन में संतुलन ,अव्यवस्था में व्यवस्था और असामंजस्य में सामंजस्य लेन की अपेक्षा नियमितता या संयम से हम अधिक प्रभावित होते हैं|स्वर और लय का संयम तथा सामंजस्य ही हमें प्रभावित करता है |
संगीत हमें आनंद ही नहीं देता बल्कि एक जीवन शैली भी देता है ..!!


क्रमशः ......

Saturday, September 3, 2011

स्वरोज सुर मंदिर ...(1)

स्वर्गीय श्रीमती सरोज अवस्थी.
मैं सरोज तुम अम्बुज मेरे ...
सरू से दूर कमल मुरझाये ...
ईमन यमन राग बिसराए ..
यमन राग मेरी  तुमसे है ........
निश्चय ही ........!!!!
मध्यम तीवर सुर लगाऊँ .........
जब लीन मगन मन सुर  साधूँ ....
तुममे खो जाऊं ...
आरोहन -अवरोहन सम्पूरण ......!!
अब रात्री का प्रथम प्रहर..
हरी भजन में ध्यान लगाऊँ .....!!
श्वेत कमल...
सब से पहले श्री मनोज जी का हार्दिक आभार व्यक्त करना चाहती हूँ जिन्होंने मुझे प्रेरित किया इस श्रंखला को प्रारंभ करने के लिए |
अब मेरी माँ, जिनका नाम श्रीमती सरोज अवस्थी था ,उनके नाम''सरोज '' में, अपने स्वरों को जोड़ कर ,मैंने अपने इस सुर मंदिर का नाम ''स्वरोज सुर मंदिर ''रखा है |माँ तो अब इस दुनियां में नहीं हैं |विदुषी थीं ...संस्कृत की ज्ञाता थीं |हम लोगों से घिरी रहकर ही वो खिली खिली रहती थीं ...!!बिलकुल इसी श्वेत ,स्निग्ध कमल की तरह ....!!-देखिये न ..उसकी परछाईं भी पानी में कितनी साफ़ दिख रही है ...!!ऐसी ही निश्छल -उज्जवल  थीं वो ...!!जो कविता मैंने उनपर लिखी है वो उनके पूरे जीवन का निचोड़ ही कहती है ....!!माँ को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ,उन्हें नमन करते हुए मैं इस श्रंखला को प्रारंभ कर रही हूँ |इस श्रंखला में समय समय पर आपको स्वरों से सम्बंधित   जानकारी देती रहूंगी |मेरी कोयल को भी धन्यवाद -उससे ऐसा नाता जुड़ा है मेरा .... मैं जहाँ भी जाती हूँ मेरा स्वरोज सुर मंदिर मेरे साथ साथ रहता है हमेशा........! प्रभु की असीम कृपा है |
                  संध्या दीपक का समय .....शाम सात बजे ...रात्री का प्रथम प्रहर शुरू होता है ....कानो में मुझे तानपुरे की वो अद्भुत नाद सुनाई देती है ......जो ह्रदय के तार  झंकृत कर देती है और ...सहज ही मन  इश्वर से जोड़ देती है |माँ की याद में संध्या दीपक जलाते हुए आज मैं ''राग यमन''  की चर्चा कर रही हूँ  |क्योंकि वो इसी समय का राग है |
|मुग़ल काल में ईमन से अब ये यमन हो गया है |इसमें मध्यम (म )तीव्र स्वर प्रयोग किया जाता है |इसके गायन का समय -रात्री का प्रथम प्रहर है|सम्पूर्ण जाती का राग है |अर्थात सभी स्वरों का -सातों स्वरों का प्रयोग इस राग में किया जाता है |कोई भी स्वर वर्जित नहीं है |कल्याण ठाट का राग है |अभी मैंने आपको एक संक्षिप्त परिचय -राग यमन   का दिया है |आगे की श्रंखलाओं में इन्ही बातों  की चर्चा करती रहूंगी जिससे कि आप इस परिचय का अर्थ भी समझ सकें | 
            संगीत की बातें समझाना बहुत सहज नहीं है |ये एक ऐसी विधा है जो जन्म जन्मान्तर तक हमारे पास ही रहती है |और इसको समझाने के लिए भी लम्बा वक्त चाहिए |मैं उम्मीद करती हूँ आप भी इस विधा से धीरे धीरे वाबस्ता हो जायेंगे |प्रथम परिचय के लिए आज इतना ही काफी है |
आपसे विनती है ....कोई भी जानकारी राग यमन पर आप मेरे साथ बाटना चाहें ....स्वागत है |

A TRIBUTE TO MY MOTHER.

रश्मि दी का आभार ..जिन्होंने मुझे प्रेरित किया ये नया सिर्फ संगीत से सम्बंधित ब्लॉग बनाने के लिए......