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Tuesday, April 2, 2013

भक्ति फाग ......

आज निज घाट बिच फाग मचैहों
ध्यान चरनन में लागैहों .....

इक सुर साधे तम्बूरा तन का ..
सांस के तार मिलैहों ...
मोद-मृदंग मंजीरा मनसा ...
तो विनय कि बीन बजैहों ..
भजन सतनाम को गईहों ...


ये भक्ति फाग ...
राग मिश्र काफी ......ताल दीपचंदी ....
अब सुनिए ......




12 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर प्यारा होली गीत.

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  2. शरीर की तरंगें जाग्रत हो गयीं

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  3. अनुपमा जी ,मुझे अपने बचपन की याद दिलादी इस गीत ने जब होली के अवसर पर मेरे पिताजी --आवागमन मिट जावै ,कोई ऐसी होरी खिलावै ...और वन कौं चले दोऊ भाई ,इन्हें कोऊ बरजै री माई आदि गीत गाते थे । बडा मधुर समां बँध जाता था । धन्यवाद ।

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  4. बंदिश और प्रस्तुति दोनों अप्रतिम .शुक्रिया .

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  5. अतिसुन्दर कोमल पदावली भाव राग आह्लादित करता हुआ ..

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  6. वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

    @मेरी बेटी शाम्भवी का कविता-पाठ

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  7. Sagit ke setra me aapka prihas sharaniye hai.

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  8. Sangit ke setra me aapka prihas srahaniye hai

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