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Thursday, January 2, 2014

राग देस ....!!



नींद जैसे कोसों ....मीलों ...दूर है ....!!..रात गहन अंधकार में डूब चुकी है ...... ....कोहरे से ढँकी ....!!नीरवता गहरा रही है ...!!किन्तु स्वर अपना कार्य नहीं भूलते .....ओस की तरह ...ओस के मोती  धीरे धीरे जमते  हुए फूलों पर ...शास्त्रीय संगीत में इतनी दिव्यता है स्वर अपना अस्तित्व  कैसे भूल सकते हैं भला ...!!....राग देस तो है ही मध्य रात्रि का राग |किन्तु प्रकृति चंचल है ........कुछ छटपटाहट  इस तरह है कि तरंगित होना है ....मन को अंधकार में डूबने नहीं देना है ...!!जाने कैसी ध्वनि है मन का सारा क्लेश हर ले रही है ......सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश की राह जो तकनी है .....राग देस सुनते सुनते ही सुबह की आमद सी होती प्रतीत होती है ....

नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ ....राग देस सुनिए ...
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इसे भी सुनिए दिव्य अनुभूति हो रही ....लगता है कृष्ण भगवान की बांसुरी सुन रहे हैं  ....
ईश्वर की उपस्थिती इस तरह महसूस हो रही है ...




Saturday, December 14, 2013

राग हंसध्वनी मे एक भजन सुनिए ....


संगीत का कार्य  मन के सोये भाव जगाना है |मन को सुकून देना आह्लाद देना है ...!!मन मे उठी सुख और दुख की अनुभूतियाँ जब गीत बनकर गूंजने लगती है तो उन्हीं को विभिन्न नामों से पुकार कर किसी राग का नाम दे दिया जाता है |


राग हंसध्वनी मे एक भजन सुनिए ।यह कर्नाटक पद्धति का राग है |इसका ठाट बिलावल है |गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर है |
दिन विश्राम चाहता है .....और रात्रि अपनी शीतलता लिए .....धीरे धीरे उतर रही है ....
थका हारा प्राणी जब थोड़ी विश्रांति चाहता है ,जीवन की जद्दोजहद के लिए थोड़ी ऊर्जा चाहता है ...आइये सुनते हैं ये भजन .....एक एक स्वर सुकून देता हुआ सा ....दिव्य आनंद की पराकाष्ठा है यहाँ ....!!सुर और ताल का भेद अभेद  है .....जाने कैसी स्वर लहरियाँ है ...जो सीधे हृदय तक पहुँचती हैं ......और देतीं हैं सिर्फ आनंद ....

Sunday, October 6, 2013

राग दरबारी कान्हड़ा ।



राग दरबारी कान्हड़ा ।
रात्रि के अंतिम प्रहर मे गाया बजाया जाता है ...!!
मंद्र सप्तक का ज्यादा प्रयोग होता है क्यूंकी रात का अंतिम प्रहर है !ऐसा प्रतीत होता है मानो अंधकार हार गया है लड़ते लड़ते .....स्वर क्षीण से ...अवरोह पर हैं .....और .............बस भोर होने को ही है ......प्रकृति भी धीर है ,गंभीर है ,चंचल नहीं है ......


पूरी राग सुनने के पश्चात भोर की सी अनुभूति होती है .....यही संगीत की ताकत है ....
कहते हैं तानसेन ने अकबर बादशाह को प्रसन्न करने के लिए ये राग गाया था !



Friday, September 20, 2013

संगीत और छंदशास्त्र .....!!

अक्षर या वाक का लयात्मक स्वरूप जब निश्चित मात्राओं मेन विभक्त होता है तो वही छंद कहलाता है !!ताल जगत में इसी को निश्चित मात्राओं में आबद्ध 'ताल 'कहते हैं !!इस प्रकार से काल की नियमित गति ही ताल या छंद को जन्म देती है ||अक्षरों के नियमित कंपन स्वर को जन्म देते हैं |संगीत में स्वर ,छंद और ताल का विशेष महत्व है |

                 भरत ने अत्यंत व्यापक रूप में वाक्  तत्व को शब्द और काल तत्व को छंद कहा है |उन्होने कहा है कि  कोई शब्द (ध्वनि)छंद  रहित नहीं और न कोई छंद  ,शब्द रहित है ;क्योंकि ध्वनि काल के बिना व्यक्त नहीं होती और काल का ज्ञान ध्वनि के बिना संभव नहीं |काल सीमा रहित है |अतः उसका ज्ञान तभी संभव है जबकि उसे खंड बनाकर बांध लिया जाये |इसके बिना काल की अभिव्यक्ति संभव नहीं होगी |भूत,भविष्य और वर्तमान की गणना ,माने गए काल -खण्डों (कल्पित )पर ही अवलंबित है |

                                      जिस पदबंध में यति,छेद इत्यादि नियत प्रमाण के आधार पर 'पाद 'बनते हैं ,तभी वह 'निबद्ध 'और पद्य कहलाता है,अन्यथा वह गद्य की श्रेणी में आता है ,जिसमे नियमित लय या गति नहीं होती |अर्थात गति को नियमित विभाजन से छंद बनता है |
आज के लिए इतना ही अगली बार इसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। ….!!

यति का अर्थ विराम है ....
छेद का अर्थ जैसे गणित में भाजक ,झटका या रुकावट से है |लय के भेद को छेद कहा गया है |
पाद अर्थात चरण ...

यहाँ ताल को ध्यान से सुनिए और स्वर और ताल का आनंद लीजिये ....
                                                                                                                                          क्रमशः 

Tuesday, August 6, 2013

मेरा पीर घर आया .....राग मियां मल्हार .....!!!!











बरसते हुए पानी में पीड़ा क्यों झरने लगती है ......


ठंडी पावन पवन आर्द्रता से भरी ..एक अजीब सी टीस लिए हुए  जब बहती है ....छू जाती है हृदय को .......तब नैनो से दो बूंद आँसू ज़रूर टपकते हैं और उस समय कहना बहुत मुश्किल है ....मन क्या कह रहा है ये समझना भी बहुत मुश्किल है ....
मनन  चिंतन से बस ईश्वर के पास होने की अनुभूति होती है .....

ये तड़प कैसी है .....
आह्लाद है या विरह .....
...राग मल्हार पर एक खूबसूरत प्रस्तुति




Tuesday, July 23, 2013

कैसी बाज रही कान्हा की बांसुरिया .......!!!

बरखा की बुंदियां बरस रही हैं ......
ठंडी पावन बह रही है ....
पत्ते मानो करतल ध्वनि से इस मौसम का स्वागत कर रहे हैं .......
धरा मे कुछ नवीनता का संचार हो रहा है ..........
पाखी हैं कि भीग भीग कर कलाबाज़ियाँ कर रहे हैं ....
इन्हीं पाखियों के साथ मेरा मन उड़ा जा रहा है ....
 अनंत  उड़ान है ये ....
वर्षा में भीगती हुई ......
न जाने कहाँ जा रही हूँ मैं ......
कोई दैविक शक्ति निरंतर अपनी ओर खींच रही है ....
बेबस खींची चली जा रही हूँ मैं ....
अचरज है .....कानो में सुनाई दे रहा है .....कुछ सुकून भरा संगीत ....
जैसे कान्हा बासुरी बाजा रहे हैं ......

क्या आप भी सुन पा रहे हैं ....या मेरा ही भ्रम है .....????????



Friday, July 19, 2013

आज रात चाँद को पुकारती रही................

आज रात चाँद को पुकारती रही
व्योम मंच पर न किन्तु चाँद आ सका
बादलों की ओट में कहीं रहा छिपा
दामिनी प्रकाश पुंज वारती रही ....
आज रात चाँद  को पुकारती रही ...

देखती रही खड़ी नयन पसार कर ...
है वियोग ही मिला सदैव  प्यार कर ...
तारकों से आरती उतरती रही ...

आज रात चाँद को पुकारती रही ...

हो गई उदास और रात रो पड़ी....
वारने लगी अमोल अश्रु की लड़ी ...
दूर से खड़ी उषा निहारती रही ...
आज रात चाँद को पुकारती रही ....

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शोभा श्रीवास्तव का लिखा ये गीत .....
अब सुनिए मेरी आवाज़  में.......
कृपया ईयर फोन से  सुने अन्यथा आवाज़ बिखरती है ....