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Saturday, April 14, 2012

वाद्यवृन्द या वृंदवादन ...!

                                                       

                                                           वाद्यवृन्द  या वृंदवादन ...!


इसे अंग्रेजी में ऑर्केस्ट्रा कहते है ।दक्षिण में इसे वाद्य कचहरी कहा जाता है ।पाणिनि -काल में वाद्यवृन्द के लिए 'तूर्य' शब्द का प्रयोग किया जाता था ।उसमे भाग लेने वाले तूर्यांग कहलाते  थे ।मुग़ल काल में नौबत कहते थे ।
वाद्यवृन्द में शास्त्रीय,अर्धशास्त्रीय तथा लोकधुनो पर आधारित रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।आधुनिक वाद्यवृन्द की शुरुआत अठारवीं सदी के अंत से मानी जाती है ।विदेशों में ऑर्केस्ट्रा शब्द का प्रयोग सत्रहवीं शताब्दी से शुरू हुआ जिसे symphony कहा जाने लगा ।इसमें कई वाद्य मिलकर रचना को प्रस्तुत करते हैं जिसके द्वारा भिन्न भिन्न भावों की सृष्टी की जाती है ।इसके प्रस्तुतीकरण में ऐसा लगता है मानो  वाद्यों की कोई गाथा  प्रस्तुत की जा रही हो ।
    वर्त्तमान में वाद्यावृन्दा के विकास में उस्ताद अल्लाउद्दीन  खान ,'स्ट्रिंग "नमक प्रथम भारतीय 'मैहर -बैंड ' के संस्थापक ,विष्णुदास शिरली,पंडित रविशंकर,लालमणि मिश्र ,जुबिन मेहता ,तिमिर्बरण,अनिल बिस्वास ,पन्नालाल घोष,टी .के .जैराम  अय्यर ,विजयराघव राव और आनंदशंकर ने बहुत योगदान दिया है ।
वाद्यवृन्द और ऑर्केस्ट्रा वाद्यों की एक ऐसी भाषा है जो एकता और सामाजिक भावना का सन्देश देती है ।

Sunday, April 8, 2012

tabla ...झपताल

                                                      झपताल 

इसमें दस मात्राएँ होतीं हैं ।२-३-२-३ मात्र के चार विभाग होते  हैं ।इसके बोल हैं ....
धी  ना ।धी  धी   ना ।ती  ना ।धी  धी  ना .
X          2                 0         3

1,3,8 पर ताली   और  छटवीं मात्र खाली ।

संगीत क्रियात्मक शास्त्र है इसलिए ये बहुत सुंदर झपताल पर कुछ ऐसी सामग्री मिली ,सोचा आपको बताऊँ ।झपताल क्या है कुछ तो समझ आइयेगा ही ।



Monday, April 2, 2012

वृन्दगान .......!!

गायक और वादकों द्वारा सामूहिक रूप से जो संगीत प्रस्तुत किया जाता है उसे वृन्दगान कहते हैं ।
शास्त्रीय संगीत में वृन्दगान या समूहगान की परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है ।इसे अंगरेजी में CHOIR  या  CHOROUS कहते हैं ।ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रों का सामूहिक उच्चारण ,देवालय में सामूहिक प्रार्थना ,कीर्तन ,भजनाथावा लोक में विभिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले लोक गीत समूह गान या समवेत गान के अंतर्गत आते हैं ।सभी वृन्दगानों का विषय प्रायः राष्ट्रीय ,सामाजिक अथवा सांस्कृतिक होता है ।पारंपरिक एकता,राष्ट्र के प्रति प्रेम,समाज की गौरवशाली परम्पराओं का उद्घोष वृन्दगान के द्वारा ही सिद्ध होता है ।

वृन्दगान रचना के मुक्य तत्त्व इस प्रकार निर्धारित किये जा सकते हैं :

  • साहित्यिक तत्व
  • सांगीतिक तत्व 
  • श्रेणी विभाजन
  • सञ्चालन .
वृन्दगान के विकास में वर्त्तमान कालीन जिन कलाकारों का उल्लेखनीय योगदान रहा है ,उनके नाम  हैं :
  • विक्टर प्रानज्योती ,
  • एम .वी .श्रीनिवासन,
  • विनयचन्द्र मौद्गल्य ,
  • सतीश भाटिया 
  • वसंत देसाई 
  • जीतेन्द्र अभिषेकी 
  • पंडित शिवप्रसाद .

Thursday, March 15, 2012

संगीत में काकु.....



भिन्न कंठ ध्वनिर्धीरै: काकुरित्यभिदीयते |

ब्रह्मकमल ..

अर्थात-कंठ की भिन्नता से ध्वनी में जो भिन्नता पैदा होती है ,उसे 'काकु' कहते हैं ।ध्वनी या आवाज़ में मनोभावों को व्यक्त करने की अद्भुत शक्ति होती है ।कंठ में जो ध्वनि- तंत्रियाँ हैं उसके स्पंदन से ध्वनी निकलती है ।
ध्वनि में मनोभावों को व्यक्त करने की विचित्र शक्ति है |शोक,भय,प्रसन्नता,प्रेम आदि भावों को व्यक्त करने के लिए जब ध्वनि या आवाज़ में भिन्नता आती है ,तब उसे काकु कहते हैं |'काकु 'का प्रयोग मनुष्य तो करते ही हैं ,पशुओं में भी 'काकु ' का प्रयोग भली-भाँती पाया जाता है |उदाहरणार्थ ,एक कुत्ता जब किसी चोर के ऊपर भौंकता है ,उसकी ध्वनि में भयंकरता होती है ;वही कुत्ता जब अपने मालिक के साथ घूमने की व्यग्रता प्रकट करता है तो उसकी ध्वनि या काकु  बदल जाती है |
     पशुओं की अपेक्षा मानव जाती में काकु  का प्रयोग विशेष रूप से पाया जाता है |एक शब्द है-जाओ |इस शब्द को काकु  के विभिन्न प्रयोगों  से देखिये ....मालिक नौकर से कहता है जाओ ...आज्ञा भाव,
माँ अपने बच्चे को मना  कर स्कूल भेजती है ...थोड़ा लाड़,प्यार या मानाने का भाव |इस प्रकार कई जगह काकु  का प्रयोग होता है |इसी प्रकार गायन में भी काकु  का प्रयोग होता है |काकु  के सुघड़ प्रयोग से भाव प्रबल गायकी होती है |संगीत को करत की विद्या कहा जाता है |अर्थात कुछ बातें एक गुरु ही अपने शिष्यों को सिखा पाते  हैं |...!स्वरों को किस प्रकार लेना कि भाव स्पष्ट हों ...ये संगीत में बहुत ज़रूरी है |कभी कभी एक ही गीत दो भिन्न लोगों से सुनने पर प्रभाव अलग होता है ।यही काकु का प्रभाव है ।
नाटक में भी काकू का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है ...!तो इस प्रकार काकु  के अंदर एक विचित्र शक्ति है ,जिसके द्वारा भावों की अभिव्यंजना में स्निग्धता,माधुर्य तथा  रस की सृष्टि होती है |संगीत के लिए तो काकु  का प्रयोग बहुत ही महत्व रखता है |