सगीत और कविता एक ही नदी की दो धाराएँ हैं ...इनका स्रोत एक ही है किन्तु प्रवाह भिन्न हो जाते हैं ...इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने ये नया ब्लॉग शुरू किया है ताकि दोनों को अपना समय दे सकूं ...!!आशा है आपका सहयोग मिलेगा.......!!
नमस्कार आपका स्वागत है
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Friday, June 11, 2021
Tuesday, July 23, 2013
कैसी बाज रही कान्हा की बांसुरिया .......!!!
बरखा की बुंदियां बरस रही हैं ......
ठंडी पावन बह रही है ....
पत्ते मानो करतल ध्वनि से इस मौसम का स्वागत कर रहे हैं .......
धरा मे कुछ नवीनता का संचार हो रहा है ..........
पाखी हैं कि भीग भीग कर कलाबाज़ियाँ कर रहे हैं ....
इन्हीं पाखियों के साथ मेरा मन उड़ा जा रहा है ....
अनंत उड़ान है ये ....
वर्षा में भीगती हुई ......
न जाने कहाँ जा रही हूँ मैं ......
कोई दैविक शक्ति निरंतर अपनी ओर खींच रही है ....
बेबस खींची चली जा रही हूँ मैं ....
अचरज है .....कानो में सुनाई दे रहा है .....कुछ सुकून भरा संगीत ....
जैसे कान्हा बासुरी बाजा रहे हैं ......
क्या आप भी सुन पा रहे हैं ....या मेरा ही भ्रम है .....????????
ठंडी पावन बह रही है ....
पत्ते मानो करतल ध्वनि से इस मौसम का स्वागत कर रहे हैं .......
धरा मे कुछ नवीनता का संचार हो रहा है ..........पाखी हैं कि भीग भीग कर कलाबाज़ियाँ कर रहे हैं ....
इन्हीं पाखियों के साथ मेरा मन उड़ा जा रहा है ....
अनंत उड़ान है ये ....
वर्षा में भीगती हुई ......
न जाने कहाँ जा रही हूँ मैं ......
कोई दैविक शक्ति निरंतर अपनी ओर खींच रही है ....
बेबस खींची चली जा रही हूँ मैं ....
अचरज है .....कानो में सुनाई दे रहा है .....कुछ सुकून भरा संगीत ....
जैसे कान्हा बासुरी बाजा रहे हैं ......
क्या आप भी सुन पा रहे हैं ....या मेरा ही भ्रम है .....????????
Friday, June 21, 2013
संगीत शास्त्र एवं गायन की जुगालबंदी है .....!!
संगीतकार के लिए पुस्तकालय रखना नितांत आवश्यक है |अध्ययन करते समय वह अपना दृष्टिकोण संकीर्ण न बनाये |प्रत्येक पुस्तक का ,चाहे वो भारतीय लेखक की हो या विदेशी लेखक की ,मनन आवश्य करना चाहिए |अपने दृष्टिकोण को उदार बनाते हुए आप जो अध्ययन करेंगे ,उससे आपका ज्ञान सर्वतोन्मुख होगा |आपके संगीत की पृष्ठभूमि उदार और गंभीर बनेगी |
संगीत का आदर्श है ,ज्ञान के सुनहले रत्नों को एकत्रित करके जाज्ज्वल्यमान प्रासाद का निर्माण करना तथा सार्वभौमिक मानव जीवन का एक्य व संगठन |संगीतज्ञों को ऎसी रचना का सृजन करना चाहिए ,जो प्रान्त व देश की सीमाओं की विभिन्नताओं में रहते हुए भी एक अव्यक्त सूत्र में मानव-हित तथा सहयोग के बिखरे हुए पल्लवों का बंदनवार कलामंदिर के चारों ओर बाँध सकने योग्य हो |इस आदर्श की पूर्ती तभी हो सकती है ,जब आप क्रियात्मक के साथ साथ शास्र का भी (theory) का भी अध्ययन करें |
इसी सबब से मैं आपको शास्त्र के बारे में भी जानकारी देती रहती हूँ कि आप संगीत के विभिन्न पहलुओं से वाबस्ता होते रहें |
आज आपको दो रागों की जुगालबंदी सुना रही हूँ ......एक अद्भुत अनुभव .....
आभार ... ......
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