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Thursday, March 30, 2017

वाद्य संगीत




संगीत की शिक्षा बचपन से दी जाये तो संगीत मन में रच बस जाता है  !! पूरी लगन से रियाज़ करते हुए एकाग्रता सतत बढ़ती  है !! एक सफल व्यक्तित्व की और बढ़ते हैं कदम .... !!

आइये सुनिये सम्राट संचेती द्वारा सिंथेसाइज़र पर  पुकारता चला हूँ मैं ..... !!






Thursday, March 26, 2015

प्रभास से पूर्ण ....!!



भोर का राग .....कितना आह्लादकारी  ....कितना सुखद ....!!ऊर्जा से प्रखर ....प्रभास से पूर्ण ....!!
साधना की पराकाष्ठा ..........!!
चल मन उड़ चलें विस्तृत आकाश के विस्तार में......


Tuesday, November 11, 2014

सुनता है गुरु ज्ञानी ....

अनायास उदास है मन !!एक प्रश्न घूम रहा है मन मे .....!!
जी रहा किस हेतु जीवन ....जोड़ मन का सेतु रेमन ........!!
अविरल अश्रुधार बस रुकी हुई बहने को अँखियों के कोरों पर !!तोड़ सारे बांध ,बहने को .....आकुल .........कुछ कहने को व्याकुल ......
फिर भी आज मौन चुनता है ये मन !!
बस आँख बंद और बहता  जाता है कुमार जी की आवाज़ के साथ ......
एक अजीब सी विश्रांति पाता है ..........जाने किस लोक का भ्रमण है ये ....








Friday, April 25, 2014

संतूर पर राग अहिरभैरव ....!!

क्षमा कीजिएगा बहुत समय बाद पोस्ट डाल  रही हूँ !

राग अहिरभैरव पर बहुत सुंदर कोम्पोज़ीशन सुनिए ,और साथ ही पंडित शिवकुमार शर्मा जी व संतूर के विषय मे कुछ जानकारी भी ....








आभार.

Tuesday, August 6, 2013

मेरा पीर घर आया .....राग मियां मल्हार .....!!!!











बरसते हुए पानी में पीड़ा क्यों झरने लगती है ......


ठंडी पावन पवन आर्द्रता से भरी ..एक अजीब सी टीस लिए हुए  जब बहती है ....छू जाती है हृदय को .......तब नैनो से दो बूंद आँसू ज़रूर टपकते हैं और उस समय कहना बहुत मुश्किल है ....मन क्या कह रहा है ये समझना भी बहुत मुश्किल है ....
मनन  चिंतन से बस ईश्वर के पास होने की अनुभूति होती है .....

ये तड़प कैसी है .....
आह्लाद है या विरह .....
...राग मल्हार पर एक खूबसूरत प्रस्तुति




Tuesday, July 23, 2013

कैसी बाज रही कान्हा की बांसुरिया .......!!!

बरखा की बुंदियां बरस रही हैं ......
ठंडी पावन बह रही है ....
पत्ते मानो करतल ध्वनि से इस मौसम का स्वागत कर रहे हैं .......
धरा मे कुछ नवीनता का संचार हो रहा है ..........
पाखी हैं कि भीग भीग कर कलाबाज़ियाँ कर रहे हैं ....
इन्हीं पाखियों के साथ मेरा मन उड़ा जा रहा है ....
 अनंत  उड़ान है ये ....
वर्षा में भीगती हुई ......
न जाने कहाँ जा रही हूँ मैं ......
कोई दैविक शक्ति निरंतर अपनी ओर खींच रही है ....
बेबस खींची चली जा रही हूँ मैं ....
अचरज है .....कानो में सुनाई दे रहा है .....कुछ सुकून भरा संगीत ....
जैसे कान्हा बासुरी बाजा रहे हैं ......

क्या आप भी सुन पा रहे हैं ....या मेरा ही भ्रम है .....????????



Saturday, July 6, 2013

वर्षा ऋतु-राग मियां मल्हार ....(.1.)....!!!


इस वर्षा ऋतु मे आपको राग मल्हार के बारे मे विस्तृत जानकारी दूँगी और इसी राग की अनेक बन्दिशें सुनवाऊंगी |
आप जानते ही होंगे राग मिया मल्हार वर्षा ऋतु का राग है |वर्षा ऋतु मे आप इसे किसी भी समय गा -बजा सकते हैं |

नदी हूँ मैं....
गिरती है ये बरसात
कुछ इस क़दर मुझ पर ...
भीगती  हूँ भरी बरसात रो भी लेती  हूँ ...

O 


मिल जाता है इसी बरखा में
मेरे आंसुओं का खारा  पानी .........
और इस तरह ...
पहुँच ही जाती है मेरी सदा  समुंदर तक ......


संवेग ,संवेदन और सिद्धान्त का ज्ञान रखने वाला कलाकार सदैव सफल रहता है ,क्योंकि उसका संगीत श्रोता को तन्मय करने की क्षमता रखता है |

राग मियां मल्हार मेँ स्वरों का प्रयोग इस प्रकार है ...........कि सुन कर ही बारिश का सा एहसास होता है ......मन भीग जाता है ....!!
म ...रे ...प $$$$$$  ग    $$$$$$$  म रे सा ....!!

नि$$$  ध  नी सा .....!!

इस प्रकार स्वरों  का प्रयोग किया जाता है ....!!






बंदिश सुनिए और बरखा का आनंद लीजिये ....

आभार .....

Friday, June 21, 2013

संगीत शास्त्र एवं गायन की जुगालबंदी है .....!!



भारतीय संगीत तो हमारी धरोहर है ही ,लेकिन एक संगीतकार की धरोहर है संगीत शास्त्र ,स्वर विज्ञानं,और संगीत प्रदर्शन |इन सबका महत्व जाने बिना संगीत के क्षेत्र में उन्नति करना कठिन है |इनमें से किसी एक का आभाव होने पर संगीत जीवन में एक अधूरापन बना रहता है जो हर संगीतकार को जीवन पर्यंत कचोटता रहता है ,भले ही वह किसी भी ऊंचाई पर क्यों न पहुच जाए |वस्तुतः यही टीस  ....यही प्यास हर संगीतकार को संगीत से जोड़े रखती है |हर संगीतकार अपना संगीत स्वयं अच्छे से पहचानता है |अपनी खामियां भी स्वयं जानता है |उन्हीं पर बार बार रियाज़ करते हुए स्वयं समझ आने लगता है कि हमारा संगीत अब उन्नति कर रहा है |यही एक छोटी सी बात है जो हर संगीतकार को खुशी देती है |
संगीतकार के लिए पुस्तकालय रखना नितांत आवश्यक है |अध्ययन करते समय वह अपना दृष्टिकोण संकीर्ण न बनाये |प्रत्येक पुस्तक का ,चाहे वो भारतीय लेखक की हो या विदेशी लेखक की ,मनन आवश्य करना चाहिए |अपने  दृष्टिकोण को उदार बनाते हुए आप जो अध्ययन करेंगे ,उससे आपका ज्ञान सर्वतोन्मुख होगा |आपके संगीत की पृष्ठभूमि उदार और गंभीर बनेगी |
संगीत का आदर्श है ,ज्ञान के सुनहले रत्नों को एकत्रित करके जाज्ज्वल्यमान प्रासाद का निर्माण करना तथा सार्वभौमिक मानव जीवन का एक्य व संगठन |संगीतज्ञों को ऎसी रचना का सृजन करना चाहिए ,जो प्रान्त व देश की सीमाओं की विभिन्नताओं में रहते हुए भी एक अव्यक्त सूत्र में मानव-हित तथा सहयोग के बिखरे हुए पल्लवों का बंदनवार कलामंदिर के चारों ओर बाँध सकने योग्य हो |इस आदर्श की पूर्ती तभी हो सकती है ,जब आप क्रियात्मक के साथ साथ शास्र का भी (theory) का भी अध्ययन करें |

इसी सबब से मैं आपको शास्त्र के बारे में भी जानकारी देती रहती हूँ कि आप संगीत के विभिन्न पहलुओं से वाबस्ता होते रहें |

आज आपको दो रागों की जुगालबंदी सुना रही हूँ ......एक अद्भुत अनुभव .....









आभार ... ......

Monday, June 17, 2013

बरसन लागी ....




मस्तिष्क से सम्बंधित प्राकृतिक ज्ञान और उसकी क्रिया प्रणाली तथा अनुभुति ,मनोविज्ञान के अंतर्गत आती है |संगीत से सम्बन्ध होने पर उसे संगीत का मनोविज्ञान कहा जाता है |मनोविज्ञान का कार्य शारीरिक उत्तेजना और चेतना के प्रवाह के सम्बन्ध को स्थापित करना है |कोई भी नाद हमारी करणेंद्रिय को किस प्रकार प्रभावित करता है ,यह सब संगीत के मनोविज्ञान की श्रेणी में आता है । कुछ ध्वनियाँ ऎसी हैं जो ह्रदय पर अपनी छाप छोड़ती ही हैं ।

रिमझिम फुहार पड़ने लगती है और मन ...बस मन भी  भीगने लगता है ....भीगे से स्वर ...टिप टिप बारिश की आवाज़  और .......चुप रह कर भी क्या चुप रहा जाता है ....भीगी भीगी हवा बोल उठती है ....

कैसी बरसात है
बहती है थमी  रहती है ....
आँख का पानी है या ..
मन के समुन्दर की बस एक बूँद ....!!!!!!


बरसन लगी सावन बुंदियाँ राजा ...







एक आह्लाद .....अमन ...एक सुकून ....कुछ चैन देता है संगीत ......!!इतना सुमधुर गीत सुन कर कौन होगा जो रस में न डूबे ...

Saturday, March 23, 2013

नमन संगीत महानायक कुमार गन्धर्व जी को ...!!

स्वर आत्मा का नाद है |इस बात की चर्चा मैं पहले की पोस्ट में कर चुकी हूँ ...!!संगीत हमारी आत्मा ग्रहण करती है इसलिए संगीत सीखना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता |इसीलिए कुछ लोग संगीत के साथ ही पैदा होते हैं ...विरासत में संगीत लेकर ....!!संगीत जन्मो जन्मो की तपस्या है ....!!





संगीत के महानायक  कुमार गन्धर्व जी के बारे में आज आपको कुछ जानकारी देने का मन है ...

कुमार जी का जन्म बेलगाम जिले के सुले भावी ग्राम में ८ अप्रैल १९२४ को एक लिंगायत परिवार में हुआ |उनका मूल नाम शिवपुत्र था |आपके पिता श्री सिद्रामप्पा कोमकली भी एक अच्छे गायक थे |

आयु के पांचवें वर्ष में ही एक दिन यकायक कुमार की प्रतिभा दृष्टिगोचर हुई |यह बालक उस दिन सवाई गन्धर्व के एक गायन जलसे में गया था |वाहन से लौटकर जब वह घर आया तो सवाई गन्धर्व द्वारा गई हुई बसंत राग की बंदिश तान और आलापों के साथ ज्यों की त्यों नक़ल करने लगा !यह देखकर इनके पिताजी आश्चर्य चकित रह गए |लोगों ने कहा ''इस बालक में पूर्वा जन्मा के संगीत संस्कार हैं अतः इसकी संगीत भावना को बल देने के लिए इसे शास्त्रीय संगीत आवश्य सिखाइये| ''फलस्वरूप कुमार जी की संगीत शिक्षा शुरू हो गई |दो ही वर्ष की तालीम में ही कुमार जी के अंदर यह विलक्षण शक्ति पैदा हो गई कि बड़े बड़े गायकों के ग्रामोफोन रिकॉर्डों की  हू -ब-हू नक़ल करने लगे | सात वर्ष की आयु में ही एक मठ  के गुरु ने उन्हें 'कुमार गन्धर्व 'की उपाधि प्रदान की |

नौं  वर्ष की आयु में कुमार गन्धर्व जी का सर्व प्रथम गायन जलसा बेलगाँव में हुआ | इसके पश्चात मुंबई के प्रोफ़ेसर देवधर ने कुमार जी को अपने संगीत विद्यालय में रख लिया | फरवरी सन १९३६ में ,मुंबई में एक संगीत परिषद हुई |उसमें कुमार गन्धर्व जी कि कला का सफल प्रदर्शन हुआ ,जिसमे श्रोतागण मुग्धा हो गए और उनका नाम संगीतज्ञों तथा संगीत कला प्रमियों में प्रसिद्द हो गया |

२३ वर्ष कि उम्र में अर्थात मई सन १९४७ ईo में कराची की एक संगीत निपुण महिला भानुमती जी से उनका विवाह हो गया |लेकिन उनका देहांत हो गया और कुमार जी को दूसरा ब्याह करना पड़ा|

दुर्भाग्य से कुमार जी तपेदिक जैसी बीमारी के शिकार हो गए |वायु परिवर्तन के लिए ही वे अपने परिवार के साथ मालवा की एक सुन्दर पहाड़ी पर बने शहर देवास में निवास करने लगे |पत्नी ने छाया कि तरह रहकर उनकी सेवा की जिसके परिणाम स्वरुप कुमार जी स्वस्थ हो गए ||तब से देवास को ही उन्होंने अपना निवास बना  लिया |

कुमार जी एक केवल मधुर गायक ही नहीं अपितु एक प्रखर कल्पनाशील कलाकार थे |लोक गीतों में शास्त्रीय संगीत का मधुर मिश्रण करके कुमार जी ने परंपरा की लीक से हटकर एक नई शैली को जन्म दिया ,जो श्रोताओं को भाव विभोर करती है |

१२ जनवरी १९९२ में आपका देहावसान हुआ ......!!