सगीत और कविता एक ही नदी की दो धाराएँ हैं ...इनका स्रोत एक ही है किन्तु प्रवाह भिन्न हो जाते हैं ...इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने ये नया ब्लॉग शुरू किया है ताकि दोनों को अपना समय दे सकूं ...!!आशा है आपका सहयोग मिलेगा.......!!
नमस्कार आपका स्वागत है
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Wednesday, February 13, 2013
Saturday, September 29, 2012
सप्रेम हरि स्मरण .....!!!!
शरीर से भगवान का भजन और भगवतस्वरूप जगत के प्राणियों की सेवा बने ,तभी शरीर की सार्थकता है ,नहीं तो शरीर नरकतुल्य है अर्थात ऐसा जीना कोई सार्थक जीना नहीं है ...!!
श्री शंकरचार्य जी ने कहा है ''को वास्ति घोरो नरकः स्वदेहः ।"
और तुलसीदास जी कहते हैं ..
."ते नर नरक रूप जीवत जग भव-भंजन -पद -बिमुख अभागी ।"
भजन और सेवा भाव तब तक जीवित रहे हमारे अन्दर जब तक किसी भीषण रोग से आक्रान्त हो हम शैया ही न पकड़ ले ...!!रात दिन सिर्फ शरीर को धोने पोछने और सजाने में ही लगे रहना ....आत्मा का चिंतन नहीं करना ....ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है ...!!
किसी भी प्रकार की कला साधना आत्मा की यात्रा है .....!
आत्मा की यात्रा है जो प्रभु तक पहुंचेगी ही ...!!मनुष्य की योनि मिली तो है ....किन्तु जन्म-मृत्यु और जरा व्याधि से ग्रस्त इस देह का कोई भरोसा नहीं ...,कब नष्ट हो जाय ....!!!जो समय हाथ आया है उसका सदुपयोग करना हमारे ही हाथ में है ...!!
खेद की बात है ...मनुष्य शरीर की सेवा में ,इसके लिए भोगों को जुटाने में ही दिन-रात व्यस्त रहता है ........!!अप्राकृत भगवदीय प्रेमरस के तो समीप भी वह नहीं जाना चाहता ...!!जिसके ध्यान मात्र से प्राणों मे अमृत का झरना फूट निकलता है ,उस भगवान से सदा दूर रहना चाहता है...!!श्रीमद्भागवत में कहा -वह हृदय पत्थर के तुल्य है ,जो भगवान के नाम -गुण-कीर्तन को सुनकर गद्गद् नहीं होता ,जिसके शरीर मे रोमांच नहीं होता और आँखों मे आनंद के आँसू नहीं उमड़ आते |
''हिय फाटहु फूटहु नयन जरौ सो तन केही काम |
द्रवइ स्त्रवई पुलकई नहीं तुलसी सुमिरत राम || "
जब प्रभु कृपा सुन कर ...भजन सुन कर ही इतना आनंद है ...तो गाने वाले की हृदय की बात सोचिए ....प्रभु की उपस्थिति सदैव बनी ही रहती है ...!!
श्रीचरणों मे नत मस्तक ही रहता है मन |अपने सुरों के ....अपने ईश्वर के पीछे ही भागता रहता है और इस तरह आत्मसात करता है स्वरों को अपनी आत्मा में ...निरंतर प्रभु की ओर अग्रसर होता हुआ ॥...हर क्षण प्रभु से दूरी घटती हुई ....!!
लता जी सुरों की देवी ही हैं ....
स्वरों से इतना प्रेम ....आज के युग में साक्षात मीरा बाई स्वरूप ही .....!!
बहुत ढूँढकर आपके लिए ये भजन लाई हूँ .....स्वर और ईश्वर का क्या रिश्ता है ...ये भजन सुन कर आप समझ पाएंगे ....
हरि हरि हरि हरि सुमिरन
हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो हरि चरणारविन्द उर धरो ..
हरि की कथा होये जब जहाँ गंगा हू चलि आवे तहां ..
यमुना सिंधु सरस्वती आवे गोदावरी विलम्ब न लावे ..
सर्व तीर्थ को वासा तहाँ सूर हरि कथा होवे जहां ..
अपनी धरोहर ...
संगीत से ...शास्त्रीय संगीत से जुड़े रहें ...
बहुत आभार .....
Sunday, May 6, 2012
संगीत की शक्ति .....(१)
ज्ञान विज्ञानं से परिपूर्ण मानव जगत में नित नए प्रयोग हो रहे हैं |जब ये प्रयोग जीवन के विभिन्न अंग बन जाते हैं ,तब मानव फिर अभिनव अनुसन्धान में प्रवृत्त हो जाता है |यद्यपि संगीत स्वयं एक विज्ञानं है ,किन्तु अभी इसकी सिद्धी के लिए वर्षों की तपस्या अपेक्षित है |इधर कुछ समय से वैज्ञानिकों का ध्यान संगीत की ओर गया है ,किन्तु संगीत के क्रियात्मक ज्ञान के आभाव के कारण हर वैज्ञानिक इस ओर ध्यान नहीं दे सकता
संसार परमाणु की सत्ता स्वीकार कर चुका है और नाद के गुण से भी वो परिचित है |किन्तु नाद कि विलक्षण शक्ति अभी अप्रकट है |जिस दिन वो प्रकट हो जायेगी ,संसार एकमत से संगीत को सर्वोपरि विज्ञानं स्वीकार कर लेगा |अणु और परमाणु का अस्तित्व उसके समक्ष नगण्य हो जायेगा |प्राचीन काल में ध्वनि के भौतिक प्रभाव पर जो प्रयोग किये गए थे ,वे आज केवल किंवदंती के रूप में अवशिष्ट हैं |किन्तु जो भी उन किंवदंतियों सुनता है ,वह भविष्य में उनकी सफलता के लिए आज के वैज्ञानिक उत्कर्ष को देख कर आस्थावान हो जाता है |हमारे प्राचीन आचार्य और महर्षियों ने हाइड्रोजन बम निश्चय ही नहीं बनाये थे ,किन्तु ध्वनि विज्ञानं पर उन्होंने जो विचार व्यक्त किये थे,वे आज भी कसौटी पर खरे उतरते हैं |नाद की शक्ति पर विवेचन करने वाले अनेक ग्रन्थ आज लुप्त हैं |
क्रमशः .........
संसार परमाणु की सत्ता स्वीकार कर चुका है और नाद के गुण से भी वो परिचित है |किन्तु नाद कि विलक्षण शक्ति अभी अप्रकट है |जिस दिन वो प्रकट हो जायेगी ,संसार एकमत से संगीत को सर्वोपरि विज्ञानं स्वीकार कर लेगा |अणु और परमाणु का अस्तित्व उसके समक्ष नगण्य हो जायेगा |प्राचीन काल में ध्वनि के भौतिक प्रभाव पर जो प्रयोग किये गए थे ,वे आज केवल किंवदंती के रूप में अवशिष्ट हैं |किन्तु जो भी उन किंवदंतियों सुनता है ,वह भविष्य में उनकी सफलता के लिए आज के वैज्ञानिक उत्कर्ष को देख कर आस्थावान हो जाता है |हमारे प्राचीन आचार्य और महर्षियों ने हाइड्रोजन बम निश्चय ही नहीं बनाये थे ,किन्तु ध्वनि विज्ञानं पर उन्होंने जो विचार व्यक्त किये थे,वे आज भी कसौटी पर खरे उतरते हैं |नाद की शक्ति पर विवेचन करने वाले अनेक ग्रन्थ आज लुप्त हैं |
विज्ञानं द्वारा ये सिद्ध हो गया है कि द्रव्य (मैटर )और शक्ति (एनर्जी ),ये दोनों एक ही वस्तु हैं |मैटर को एनर्जी और एनर्जी को मैटर में परिवर्तित किया जा सकता है ,अर्थात परम तत्व एक ही है |अतः शब्द का प्रभाव बड़ा विलक्षण है |जिस प्रकार मिटटी का गुण 'गंध ' और अग्नि का गुण 'उष्णता ' है ,उसी प्रकार आकाश का गुण 'शब्द 'है |वह सदा आकाश में विद्यमान रहता है ।इस सत्य को जान लेने पर कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि वे शीघ्र ही किसी उपकरण की सहायता से तानसेन का गायन और भगवन श्री कृष्ण के मुख से कही गई गीता को आकाश से ग्रहण कर उन्हीं की आवाज़ में सुनवा सकेंगे ।
क्रमशः .........
Thursday, March 22, 2012
पुरी में आनंद भयो .
साधना जी कहरवा भजनी ठेका पर ये भजन प्रस्तुत है ...!!
शुभ समय भी है ....कल से नवरात्र प्रारंभ है ...नव संवत्सर आप सभी को मंगलमय हो ....!!
घर आ गए लक्ष्मण राम
पुरी में आनंद भयो .
सुरा गऊअन के गुबर मंगाए ,
डिगधर अंगन लिपाये ,
गज मुतियन के चौक पुराए
कंचन कलश लिसाए
पुरी में आनंद भयो ....
मात कौशल्या पूछन लागीं
कहो बन की कछु बात
कितने दिन में रावन मारे
दियो विभीषण राज
पुरी में आनंद भयो ...
आठ घाट के रावन मारे
मेघनाद बलवान
कुम्भकरण से जोधा मारे ...
राज्य विभीषण पाए
पुरी में आनंद भयो ....
मात कौशल्या करें आरती
सखियाँ मंगल गाएँ
घर-घर बाजे अनंद बधैया
तुलसीदास गुण गायें ....
पुरी में अनंद भयो ....
शुभ समय भी है ....कल से नवरात्र प्रारंभ है ...नव संवत्सर आप सभी को मंगलमय हो ....!!
घर आ गए लक्ष्मण राम
पुरी में आनंद भयो .
सुरा गऊअन के गुबर मंगाए ,
डिगधर अंगन लिपाये ,
गज मुतियन के चौक पुराए
कंचन कलश लिसाए
पुरी में आनंद भयो ....
मात कौशल्या पूछन लागीं
कहो बन की कछु बात
कितने दिन में रावन मारे
दियो विभीषण राज
पुरी में आनंद भयो ...
आठ घाट के रावन मारे
मेघनाद बलवान
कुम्भकरण से जोधा मारे ...
राज्य विभीषण पाए
पुरी में आनंद भयो ....
मात कौशल्या करें आरती
सखियाँ मंगल गाएँ
घर-घर बाजे अनंद बधैया
तुलसीदास गुण गायें ....
पुरी में अनंद भयो ....
Tuesday, January 31, 2012
दमादम मस्त कलंदर .....
मैं सोचती हूँ ...शास्त्रीय संगीत मेरी आत्मा है ...!लेकिन मुझ जैसे और भी लोग हैं जिनकी आत्मा है शास्त्रीय संगीत ...!!शायद मुझसे भी ज्यादा लगाव है संगीत से उनका ...!!
गाना बजाना और सुनना ...
गाना बजाना और सुनना ...
किन्तु न गायक न वादक न श्रोता ...यहाँ सिर्फ संगीत है .....एक रूप ...उसी में सब समां जाना चाहते हैं ...संगीत सब को एक लहर में बहा ले जाता है ....इस अनुभूति के लिए .. ...इस शाम के लिए मैं अपने आप को धन्य मानती हूँ .....
सिंथ पर हैं मुकेश कानन जी
तबले पर हैं हमित वालिया जी .
दमादम मस्त कलंदर .....सुनिए ....
Saturday, December 3, 2011
अलंकार ...
प्राचीन ग्रंथकार 'अलंकार 'की परिभाषा इस प्रकार कहते हैं :

विशिष्ट वर्ण सन्दर्भमलंकर प्रचक्षते
अर्थात-कुछ नियमित वर्ण समुदाओं को अलंकार कहते हैं |
अलंकार का शाब्दिक अर्थ हुआ सजाना या शोभा बढ़ाना |तो अलंकार हुआ आभूषण या गहना |जिस प्रकार आभूषण से शरीर की शोभा बढ़ती है ...उसी प्रकार अलंकार से गायन की शोभा बढ़ती है |
जैसे चन्द्रमा के बिना रात्री ,जल के बिना नदी,फूल के बिना लता तथा आभूषण के बिना स्त्री शोभा नहीं पाती ,उसी प्रकार अलंकार बिना गीत भी शोभा को प्राप्त नहीं होते |
अलंकार को पलटा भी कहते हैं |गायन सीखने से पहले विद्यार्थियों को विभिन्न अलंकार सिखाये जाते है |इससे स्वर ज्ञान अच्छा होता है |राग-विस्तार में सहायता मिलती है |इनकी सहायता से अपनी कल्पनाशक्ति से आप राग जैसा चाहें सजा सकते हैं |ताने भी अलंकारों के आधार पर ही बनती हैं|
स्वर स्थान समझने के लिए ..या यूँ कहूं की ये जानने के लिए की सा से रे ,रे से ग ,ग से म क्रमशः स्वरों की दूरी परस्पर कितनी है हमें अलंकारों का अभ्यास करना पड़ता है |जैसे :
आरोह :सारेग ,रेगम ,गमप,मपध ,पधनी ,धनिसां ||
अवरोह :सांनिध ,निधप,धपम ,पमग ,मगरे ,गरेसा ||
अलंकार वर्ण समुदायों में ही होते हैं|उदाहरण के लिए वर्ण समुदाय को लीजिये ...सा रे ग सा |इसमें आरोही-अवरोही दोनों वर्ग आ गए हैं|यह एक सीढ़ी मान लीजिये|अब इसी आधार पर आगे बढिए ...और पिछला स्वर छोड़कर आगे का स्वर बढ़ाते जाइए |रे ग म रे ..ये दूसरी सीढ़ी हुई ...
सा रे ग सा ,
रे ग म रे ,
ग म प ग ,
म प ध म ,
प ध नि प,
ध नि सा ध
नि सां रें नि ,
सां रें गं सां
अवरोह ...में वापस आना है |
सां रें गं सां
नि सां रें नि ,
ध नि सा ध .....
इस प्रकार ...!
इसी प्रकार बहुत से अलंकार तैयार किये जा सकते है |राग में लगने वाले स्वरों के आधार पर |अलंकार क्या है ये समझाने कीमैंने पूरी कोशिश की है ...पता नहीं किस हद तक समझा पाई हूँ क्योंकि ये क्रियात्मक शास्त्र है |पहले हम खूब गा कर मन में स्वरों को बिठाते हैं ...रट-रट कर ...बाद में शास्त्र कुछ समझ में आता है |
अगर कुछ प्रश्न हो ज़रूर पूछ लीजिये ...मेरा सौभाग्य होगा अगर मैं कुछ बता पाऊं ...!

विशिष्ट वर्ण सन्दर्भमलंकर प्रचक्षते
अर्थात-कुछ नियमित वर्ण समुदाओं को अलंकार कहते हैं |
अलंकार का शाब्दिक अर्थ हुआ सजाना या शोभा बढ़ाना |तो अलंकार हुआ आभूषण या गहना |जिस प्रकार आभूषण से शरीर की शोभा बढ़ती है ...उसी प्रकार अलंकार से गायन की शोभा बढ़ती है |
जैसे चन्द्रमा के बिना रात्री ,जल के बिना नदी,फूल के बिना लता तथा आभूषण के बिना स्त्री शोभा नहीं पाती ,उसी प्रकार अलंकार बिना गीत भी शोभा को प्राप्त नहीं होते |
अलंकार को पलटा भी कहते हैं |गायन सीखने से पहले विद्यार्थियों को विभिन्न अलंकार सिखाये जाते है |इससे स्वर ज्ञान अच्छा होता है |राग-विस्तार में सहायता मिलती है |इनकी सहायता से अपनी कल्पनाशक्ति से आप राग जैसा चाहें सजा सकते हैं |ताने भी अलंकारों के आधार पर ही बनती हैं|
स्वर स्थान समझने के लिए ..या यूँ कहूं की ये जानने के लिए की सा से रे ,रे से ग ,ग से म क्रमशः स्वरों की दूरी परस्पर कितनी है हमें अलंकारों का अभ्यास करना पड़ता है |जैसे :
आरोह :सारेग ,रेगम ,गमप,मपध ,पधनी ,धनिसां ||
अवरोह :सांनिध ,निधप,धपम ,पमग ,मगरे ,गरेसा ||
स्वरों से समूह को ले कर आरोह और अवरोह करते हैं विभिन्न अलंकार |
ये कई प्रकार से किये जा सकते हैं |
अलंकार वर्ण समुदायों में ही होते हैं|उदाहरण के लिए वर्ण समुदाय को लीजिये ...सा रे ग सा |इसमें आरोही-अवरोही दोनों वर्ग आ गए हैं|यह एक सीढ़ी मान लीजिये|अब इसी आधार पर आगे बढिए ...और पिछला स्वर छोड़कर आगे का स्वर बढ़ाते जाइए |रे ग म रे ..ये दूसरी सीढ़ी हुई ...
सा रे ग सा ,
रे ग म रे ,
ग म प ग ,
म प ध म ,
प ध नि प,
ध नि सा ध
नि सां रें नि ,
सां रें गं सां
अवरोह ...में वापस आना है |
सां रें गं सां
नि सां रें नि ,
ध नि सा ध .....
इस प्रकार ...!
इसी प्रकार बहुत से अलंकार तैयार किये जा सकते है |राग में लगने वाले स्वरों के आधार पर |अलंकार क्या है ये समझाने कीमैंने पूरी कोशिश की है ...पता नहीं किस हद तक समझा पाई हूँ क्योंकि ये क्रियात्मक शास्त्र है |पहले हम खूब गा कर मन में स्वरों को बिठाते हैं ...रट-रट कर ...बाद में शास्त्र कुछ समझ में आता है |
अगर कुछ प्रश्न हो ज़रूर पूछ लीजिये ...मेरा सौभाग्य होगा अगर मैं कुछ बता पाऊं ...!
Sunday, November 20, 2011
संधि प्रकाश राग से प्रकाशित ..गुंजित...धरा ....!!
संधि प्रकाश राग क्या हैं ...?
स्पंदन ...जीवन ...और संगीत ...एक चोटी की तरह गुंथे हुए हैं...!जब से मनुष्य का जीवन है तभी से ही संगीत का अधिपत्य इस धरा पर है ...!जन-जन के हृदय में बसा लोक-संगीत ...जन्म पर गाये जाने वाले सोहर से लेकर मृत्यु पर राम नाम सत्य का जाप ....संगीत से कुछ भी तो अछूता नहीं है .....!!किसी श्राप से श्रपित हो हम उसे अपने हृदय से दूर कर देते हैं किन्तु इतिहास गवाह है इस बात का ...जहाँ संगीत है वहां खुशहाली हमेशा रहती है ...!!और जहाँ खुशहाली है वहां संगीत का दर्जा बहुत ऊपर रहता है ...!!दोनों ही बातें हैं |
साधक को यह बात ध्यान देना है कि स्वरों का आन्दोलन किस प्रकार हो कि हृदय के आन्दोलन को छू जाये |एक सफल संगीतज्ञ का कार्य ही यही है |कला में अपनी बात मनवाने की ताक़त होती है अगर उसे साधना की तरह लिया जाये ...!मैंने पहले चर्चा कि है कि समय के आधार पर रागों का वर्गीकरण हुआ है |अब पूरे चौबीस घंटों में दो बार ऐसा होता है कि अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है |या दोनों कि संधि होती है ........एक बार अन्धकार प्रकाश में विलीन हो जाता है और एक बार प्रकाश अपना तेज त्याग ...अन्धकार में घुप्प हो.. सो जाता है ...!!शायद जीवन की आपा धापी से थका हुआ ...या ...कर्तव्य बोध से फिर भी बंधा हुआ ...कि कुछ क्षण नींद ज़रूरी है ...!तो...इन दोनों समय को संगीत कि भाषा में संधिप्रकाश काल कहते हैं |और इस समय गाए जाने वाले राग संधिप्रकाश राग कहलाये जाते हैं |ये संधिप्रकाश राग दो तरह के होते :
1-प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग
2-सांयकालीन संधिप्रकाश राग
प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग गायन का समय प्रातः चार से सात बजे का है |भैरव,तोड़ी ,उसके सभी प्रकार और रामकली इस समय के राग हैं |
सांयकालीन संधिप्रकाश राग में पूरिया ,मारवा ,पूरिया धनाश्री आदि आते हैं |
इनको किस प्रकार लिया जाता है इसी चर्चा अगले अंक में ....
स्पंदन ...जीवन ...और संगीत ...एक चोटी की तरह गुंथे हुए हैं...!जब से मनुष्य का जीवन है तभी से ही संगीत का अधिपत्य इस धरा पर है ...!जन-जन के हृदय में बसा लोक-संगीत ...जन्म पर गाये जाने वाले सोहर से लेकर मृत्यु पर राम नाम सत्य का जाप ....संगीत से कुछ भी तो अछूता नहीं है .....!!किसी श्राप से श्रपित हो हम उसे अपने हृदय से दूर कर देते हैं किन्तु इतिहास गवाह है इस बात का ...जहाँ संगीत है वहां खुशहाली हमेशा रहती है ...!!और जहाँ खुशहाली है वहां संगीत का दर्जा बहुत ऊपर रहता है ...!!दोनों ही बातें हैं |
साधक को यह बात ध्यान देना है कि स्वरों का आन्दोलन किस प्रकार हो कि हृदय के आन्दोलन को छू जाये |एक सफल संगीतज्ञ का कार्य ही यही है |कला में अपनी बात मनवाने की ताक़त होती है अगर उसे साधना की तरह लिया जाये ...!मैंने पहले चर्चा कि है कि समय के आधार पर रागों का वर्गीकरण हुआ है |अब पूरे चौबीस घंटों में दो बार ऐसा होता है कि अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है |या दोनों कि संधि होती है ........एक बार अन्धकार प्रकाश में विलीन हो जाता है और एक बार प्रकाश अपना तेज त्याग ...अन्धकार में घुप्प हो.. सो जाता है ...!!शायद जीवन की आपा धापी से थका हुआ ...या ...कर्तव्य बोध से फिर भी बंधा हुआ ...कि कुछ क्षण नींद ज़रूरी है ...!तो...इन दोनों समय को संगीत कि भाषा में संधिप्रकाश काल कहते हैं |और इस समय गाए जाने वाले राग संधिप्रकाश राग कहलाये जाते हैं |ये संधिप्रकाश राग दो तरह के होते :
1-प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग
2-सांयकालीन संधिप्रकाश राग
प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग गायन का समय प्रातः चार से सात बजे का है |भैरव,तोड़ी ,उसके सभी प्रकार और रामकली इस समय के राग हैं |
सांयकालीन संधिप्रकाश राग में पूरिया ,मारवा ,पूरिया धनाश्री आदि आते हैं |
इनको किस प्रकार लिया जाता है इसी चर्चा अगले अंक में ....
Thursday, November 10, 2011
संगीत में मध्यम स्वर का महत्व ..!!
भारतीय संगीत के सात स्वरों में से मध्यम स्वर बड़े महत्व का है |इस स्वर के प्रयोग से हमें यह मालूम पड़ता है कि अमुक राग का गायन समय दिन है या रात्री |संगीत के शास्त्रकारों ने चौबीस घंटों के समय को दो बराबर भागों में विभाजित किया है |प्रथम भाग को पूर्वार्ध कहा ,जिसका गायन समय रात्री के बारह बजे से दिन के बारह बजे माना अर्थात A.M में |दूसरे भाग को उत्तरार्ध कहा जिसका गायन समय दिन के बारह बजे से रात्री के बारह बजे तक माना अर्थात P.M में |
दिन के पहले भाग में शुद्ध म की और दूसरे भाग में तीव्र म की प्रधानता मानी गयी है |
उदाहरण:1-भैरव व बहार लीजिये |इन दोनों रागों में शुद्ध मध्यम का प्रयोग होता है तो ये अनुमान लगाया जा सकता है किये राग दिन के पूर्वार्ध में ,अर्थात रात्री के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक गाये-बजाये जाते हैं |
2-यमन में तीव्र मध्यम का प्रयोग है इसलिए ये राग उत्तरार्ध में यानी रात के प्रथम प्रहर में गाया बजाया जाता है |
इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं |तोड़ी ,हिंडोल,भीमपलासी दुर्गा,देश,बागेश्वरी आदि इस नियम का खंडन करते हैं |
इस नियम का पालन संधिप्रकाश रागों में निश्चित रूप से होता है
संधिप्रकाश राग क्या है इसकी चर्च अगली पोस्ट में करेंगे ....
क्रमशः ...
दिन के पहले भाग में शुद्ध म की और दूसरे भाग में तीव्र म की प्रधानता मानी गयी है |
उदाहरण:1-भैरव व बहार लीजिये |इन दोनों रागों में शुद्ध मध्यम का प्रयोग होता है तो ये अनुमान लगाया जा सकता है किये राग दिन के पूर्वार्ध में ,अर्थात रात्री के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक गाये-बजाये जाते हैं |
2-यमन में तीव्र मध्यम का प्रयोग है इसलिए ये राग उत्तरार्ध में यानी रात के प्रथम प्रहर में गाया बजाया जाता है |
इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं |तोड़ी ,हिंडोल,भीमपलासी दुर्गा,देश,बागेश्वरी आदि इस नियम का खंडन करते हैं |
इस नियम का पालन संधिप्रकाश रागों में निश्चित रूप से होता है
संधिप्रकाश राग क्या है इसकी चर्च अगली पोस्ट में करेंगे ....
क्रमशः ...
Tuesday, September 20, 2011
राग यमन .....सरगम गीत का अन्तरा.....
![]() |
| पीत कमल .. |
ठाट :कल्याण
जाती :सम्पूर्ण
समय :रात्री का प्रथम प्रहर
वादी :ग(गंधार)
संवादी:नि (निषाद)
आरोह: नि रे ग म प धनि सां
अवरोह: सां नि ध प म ग रे सा
सरगम गीत का अन्तरा दे रही हूँ .....कोशिश करूंगी इसे पोडकास्ट भी कर सकूँ ...किन्तु उसके लिए थोडा और वक़्त लगेगा ...
अन्तरा.....
म ग म प सां $ सां $ सां रें गं रें सां नि ध प
गं रें सां नि ध प नि ध प म ग रे ग रे सा $
नि रे ग म प ध नि सां रें नि ध प म प ग म
कृपया पढ़ते रहें ...और अभ्यास जारी रखें.......
Sunday, September 11, 2011
राग यमन ....वादी -संवादी .....
![]() |
| श्वेत कमल... |
ठाट :कल्याण
जाती :सम्पूर्ण
समय :रात्री का प्रथम प्रहर
वादी :ग(गंधार)
संवादी:नि (निषाद)
आरोह: नि रे ग म प धनि सां
अवरोह: सां नि ध प म ग रे सा
राग यमन की चर्चा चल रही है ...!!
इसका वादी ग और संवादी नि है |आज मैं आपको बताती हूँ वादी ,संवादी क्या होता है ...
वादी मतलब मुख्य स्वर ..
राग विस्तार :नि रे ग$$ ,रे ग$$ ,म $ ग$$ , पम ग रे ग$$$$,नि रे सा $$$
यहाँ आप देख रहे होंगे दूसरे स्वर लेने के बाद ग पर आकर हम थोड़ा रुकते हैं ... और स्वरों की अपेक्षा ग बार बार भी आ रहा है और वहां पर ठहराव भी है इसलिए ये राग का वादी स्वर है .
ठीक इसी प्रकार नि राग में ग से कम उपयोग में आता है तो वो संवादी स्वर कहलाता है |
यह यमन की स्वर मालिका है ....16 मात्र ताल - तीनताल में निबद्ध.........
यह यमन की स्वर मालिका है ....16 मात्र ताल - तीनताल में निबद्ध.........
स्थाई ...
नि ध - प म प ग म प - - - प म ग रे
सा रे ग रे ग म प ध प म ग रे ग रे सा -
नि रे ग म प ध नि सां रे सां नि ध प म ग म
अन्तरा अगले भाग में ...स्थाई समझने के बाद .....
जब हम कार चलाना सीखते हैं ..बड़े ध्यान से पहले पहला गेयर ....फिर दूसरा ...फिर तीसरा ...चौथे गेयर में चलने के लिए धैर्य चाहिए न ...? वैसे ही संगीत समझने के लिए धैर्य की आवश्यकता है ...अपना धैर्य खोएं नहीं इसे पढ़ते रहें .....!!
आभार.
Monday, September 5, 2011
राग यमन और राग की जाती ...
![]() |
| अरुण कमल |
ठाट :कल्याण
जाती :सम्पूर्ण
समय :रात्री का प्रथम प्रहर
वादी :ग(गंधार)
संवादी:नि (निषाद)
आरोह: नि रे ग म प धनि सां
अवरोह: सां नि ध प म ग रे सा
राग कल्याण की हम चर्चा कर रहे थे|इसमें तीव्र मध्यम का प्रयोग किया जाता है|कई बार पंचम और षडज वर्जित करके गंधार और निषाद का महत्व राग की विशेषता के रूप में दिखाया जाता है |यही सच्चा यमन है |
जैसे शुरुआत में ....नि रेग , ...मधनिसां ..
यहाँ ये भी बताना चाहूंगी की प्रत्येक राग में जो मुख्य स्वर होता है वो -वादी और दूसरा मुख्य स्वर -संवादी कहलाता है |यमन में ग-वादी है और नि-संवादी है |
आज यमन की ही चर्चा करते करते मैं ये भी बताना चाहूंगी की किसी भी राग को गाने के लिए कम से कम पांच स्वरों का होना आवश्यक है |इसी के आधार पर हम राग की जाती निश्चित करते हैं |सातों स्वर लगाने पर सम्पूर्ण जाती....छः स्वर लगाने पर षाडव जाती और पांच स्वर लगाने पर औडव जाती हो जाती है |तो राग की जाती तीन हुईं :
1-संपूर्ण
2-षाडव
3-औडव
आरोह -अवरोह देखते हुए अब कुल नों जातियां बनातीं हैं:
1-संपूर्ण-संपूर्ण
2-संपूर्ण-षाडव
3-संपूर्ण-औडव
4-षाडव-संपूर्ण
5-षाडव-षाडव
6-षाडव-औडव
7-औडव- संपूर्ण
8-औडव-षाडव
5-षाडव-षाडव
6-षाडव-औडव
7-औडव- संपूर्ण
8-औडव-षाडव
9-औडव-औडव
ये राग के बारे में बहुत मूलभूत बातें हैं इन्हें समझाना बहुत ज़रूरी है |अब आप समझ ही गए होंगे की राग यमन या कल्याण सम्पूर्ण जाती का राग है |इसमें सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है |
Sunday, September 4, 2011
स्वरोज सुर मंदिर (4)राग और थाट में अंतर ....
![]() |
| अरुण कमल |
सबसे पहले आभार आप सभी का इस श्रंखला में रूचि लेने हेतु ..!
मनोज जी आपने प्रश्न पूछा था की राग और थाट में क्या अंतर है ..?
आज यहीं से इस आलेख की शुरुआत करती हूँ |आधुनिक काल में यह पद्धति थाट -राग वर्गीकरण के नाम से प्रचलन में आई |जैसा की मैंने आपको बताया था संपूर्ण रगों को ,उनके स्वर प्रयोग के आधार पर ,दस थाटों में विभाजित किया गया है |फिलहाल हम कल्याण थाट की बात कर रहें हैं |कल्याण थाट में कई राग आते हैं ..जैसे -भूपाली,कल्याण,छायानट,केदार,कामोद,गौड़ सारंग,हमीर ...इत्यादि |अब इन्हीं सब रागों से राग कल्याण पर हमने थाट का नाम भी कल्याण कर दिया |तो कल्याण थाट भी है और राग भी |अब भूपाली को लीजिये ...उसका वर्णन करते समय हम कहेंगे थाट- कल्याण ..राग -भूपाली ...|
आज यहीं से इस आलेख की शुरुआत करती हूँ |आधुनिक काल में यह पद्धति थाट -राग वर्गीकरण के नाम से प्रचलन में आई |जैसा की मैंने आपको बताया था संपूर्ण रगों को ,उनके स्वर प्रयोग के आधार पर ,दस थाटों में विभाजित किया गया है |फिलहाल हम कल्याण थाट की बात कर रहें हैं |कल्याण थाट में कई राग आते हैं ..जैसे -भूपाली,कल्याण,छायानट,केदार,कामोद,गौड़ सारंग,हमीर ...इत्यादि |अब इन्हीं सब रागों से राग कल्याण पर हमने थाट का नाम भी कल्याण कर दिया |तो कल्याण थाट भी है और राग भी |अब भूपाली को लीजिये ...उसका वर्णन करते समय हम कहेंगे थाट- कल्याण ..राग -भूपाली ...|
इस प्रकार हर थाट में कोई एक ऐसा राग होता है जो राग भी है और थाट भी |फिर आगे मैं आपको बताउंगी कि हर थाट में कुछ स्वर संगतियाँ समान होती हैं |हर थाट कि कुछ विशेष बातें होतीं हैं जो उसके अंतर्गत आने वाली हर राग में झलकती है|
थाट कल्याण की मुख्य विशेषता है तीव्र मध्यम का प्रयोग....!!
यहाँ मैं आपको पुराना लिंक भी दे रहीं हूँ उसको पढ़ने से भी थाट के बारे में समझ और बढ़ सकेगी ...!!
आगली कड़ी में हम चर्चा करेंगे कल्याण थाट की कुछ अन्य विशेषताओं के बारे में ...!!
ये भी पढ़ें ... परिकल्पना पर ..कुछ उनकी कुछ इनकी...आभार..
स्वरोज सुर मंदिर (3)ठाट ,आहत नाद अनाहत नाद
स्वरोज सुर मंदिर की तीसरी कड़ी प्रस्तुत है ..!!
नाद ब्रम्ह.....परब्रम्ह ...!!
प्रभु तक पहुँचाने का एक मार्ग संगीत भी है नाद के विषय में कुछ रोचक जानकारी से आज की चर्चा प्रारंभ करते हैं |आज नाद के गुण और उसके प्रकार के विषय में चर्चा करते हैं
प्रभु तक पहुँचाने का एक मार्ग संगीत भी है नाद के विषय में कुछ रोचक जानकारी से आज की चर्चा प्रारंभ करते हैं |आज नाद के गुण और उसके प्रकार के विषय में चर्चा करते हैं
नाद के दो प्रकार होते हैं :
- आहत नाद
- अनाहत नाद .
आहत नाद :जो कानो को सुनाई देता है और जो दो वस्तुओं के रगड़ या संघर्ष से पैदा होता है उसे आहत नाद कहते हैं |इस नाद का संगीत से विशेष सम्बन्ध है |यद्यपि अनाहत नाद को मुक्तिदाता मन गया है किन्तु आहात नाद को भी भाव सागर से पार लगानेवाला बताया गया है |इसी नाद के द्वारा सूर,मीरा इत्यादि ने प्रभु-सानिध्य प्राप्त किया था और फिर अनाहत की उपासना से मुक्ति प्राप्त की ...!
अनाहत नाद ::जो नाद केवल अनुभव से जाना जाता है और जिसके उत्पन्न होने का कोई खास कारन न हो ,यानि जो बिना संघर्ष के स्वयंभू रूप से उत्पन्न होता है ,उसे अनाहत नाद कहते हैं ;जैसे दोनों कान जोर से बंद अनुभव करके देखा जाये ,तो 'साँय-साँय ' की आवाज़ सुनाई देती है
इसके बाद नादोपसना की विधि से गहरे ध्यान की अवस्था में पहुँचने पर सूक्ष्म नाद सुनाई पड़ने लगता है जो मेघ गर्जन या वंशिस्वर आदि से सदृश होता है |इसी अनाहत नाद की उपासना हमारे प्राचीन ऋषि -मुनि करते थे |यह नाद मुक्ति दायक तो है ...किन्तु रक्तिदायक नहीं |इसलिए ये संगीतोपयोगी भी नहीं है ,अर्थात संगीत से अनाहत नाद का कोई सम्बन्ध नहीं है |
वास्तव में ध्वनि का वर्गीकरण वैज्ञानिक ढंग से तीन गुणों के अधर पर किया जा सकता है :
अनाहत नाद ::जो नाद केवल अनुभव से जाना जाता है और जिसके उत्पन्न होने का कोई खास कारन न हो ,यानि जो बिना संघर्ष के स्वयंभू रूप से उत्पन्न होता है ,उसे अनाहत नाद कहते हैं ;जैसे दोनों कान जोर से बंद अनुभव करके देखा जाये ,तो 'साँय-साँय ' की आवाज़ सुनाई देती है
इसके बाद नादोपसना की विधि से गहरे ध्यान की अवस्था में पहुँचने पर सूक्ष्म नाद सुनाई पड़ने लगता है जो मेघ गर्जन या वंशिस्वर आदि से सदृश होता है |इसी अनाहत नाद की उपासना हमारे प्राचीन ऋषि -मुनि करते थे |यह नाद मुक्ति दायक तो है ...किन्तु रक्तिदायक नहीं |इसलिए ये संगीतोपयोगी भी नहीं है ,अर्थात संगीत से अनाहत नाद का कोई सम्बन्ध नहीं है |
वास्तव में ध्वनि का वर्गीकरण वैज्ञानिक ढंग से तीन गुणों के अधर पर किया जा सकता है :
- तारता अर्थात नाद का ऊँचा -नीचपन (Pitch.)
- तीव्रता या प्रबलता अथवा नाद का छोटा बड़ापन (Loudness)
- गुण या प्रकार (Timbre)
चलिए अब लौट चलते हैं राग यमन पर |आपको आज राग यमन की विस्तृत जानकारी देती हूँ|
ठाट :कल्याण जाती :सम्पूर्ण समय :रात्री का प्रथम प्रहार
वादी :ग(गंधार) संवादी:नि (निषाद)
आरोह: नि रे ग म प धनि सां
अवरोह: सां नि ध प म ग रे सा
मध्यकालीन ग्रंथों में यमन का उल्लेख मिलाता है |परन्तु प्राचीन ग्रंथों में केवल कल्याण राग दिखाई देता है यमन नहीं |आधुनिक ग्रंथों में यमन एक सम्पूर्ण जाती का राग माना गया है |
राग का अध्ययन करते करते ही अब आपको राग वर्णन में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न सब्दों की जानकारी देती हूँ सबसे पहले देखें ठाट क्या है ...?
ठाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे राग उत्पन्न हो सके | पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम काल में 'राग तरंगिणी ' के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परंपरागत 'ग्राम और मूर्छना -प्रणाली' का परिमार्जन करके मेल अथवा ठाट को सामने रखा |उस समय तक लोचन कवि के अनुसार सोलह हज़ार राग थे ,जिन्हें गोपियाँ कृष्ण के सामने गया करती थीं;किन्तु उनमे से छत्तीस राग प्रसिद्द थे |सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अंतर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचार में आ गया,जो उस समय के प्रसिद्द ग्रन्थ 'संगीत -पारिजात'और 'राग विबोध'में स्पष्ट है |इस प्रकार लोचन कवी से आरंभ होकर यह ठाट पद्धति चक्कर काटती हुई श्री भातखंडे जी के समय में आकर वैधानिक रूप से स्थिर हो गई |
रागों का अध्ययन करने के हिसाब से सात स्वरों के प्रयोग के आधार पर ठाट का निर्माण किया गया |इस प्रकार हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुसार अब हम भातखंडे जी द्वारा बताये गए दस ठाट मानते हैं |जो इस प्रकार हैं:
बिलावल ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (सभी स्वर शुद्ध प्रयोग)
यमन या कल्याण ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (म तीव्र )
खमाज ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (नी कोमल)
भैरव ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे ध कोमल )
पूर्वी ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे ध कोमल म तीव्र )
मारवा ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे कोमल म तीव्र )
काफी ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (ग नी कोमल)
असावरी ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (ग ध नी कोमल )
भैरवीं ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे ग ध नी कोमल )तोड़ी ठाट :
सा रे ग म प ध नी सां | (रे ग ध नी कोमल म तीव्र )
अब आप ये बात समझ सकेंगे कि राग यमन कल्याण ठाट का राग है क्योंकि उसमे म तीव्र प्रयोग होता है |
आज के लिए इतना बहुत है ... कोई बात समझ न आई हो तो कृपया निसंकोच पूछ लें ...फिर शीघ्र मिलेंगे ...
क्रमशः ........
रागों का अध्ययन करने के हिसाब से सात स्वरों के प्रयोग के आधार पर ठाट का निर्माण किया गया |इस प्रकार हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुसार अब हम भातखंडे जी द्वारा बताये गए दस ठाट मानते हैं |जो इस प्रकार हैं:
बिलावल ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (सभी स्वर शुद्ध प्रयोग)
यमन या कल्याण ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (म तीव्र )
खमाज ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (नी कोमल)
भैरव ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे ध कोमल )
पूर्वी ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे ध कोमल म तीव्र )
मारवा ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे कोमल म तीव्र )
काफी ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (ग नी कोमल)
असावरी ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (ग ध नी कोमल )
भैरवीं ठाट : सा रे ग म प ध नी सां | (रे ग ध नी कोमल )तोड़ी ठाट :
सा रे ग म प ध नी सां | (रे ग ध नी कोमल म तीव्र )
अब आप ये बात समझ सकेंगे कि राग यमन कल्याण ठाट का राग है क्योंकि उसमे म तीव्र प्रयोग होता है |
आज के लिए इतना बहुत है ... कोई बात समझ न आई हो तो कृपया निसंकोच पूछ लें ...फिर शीघ्र मिलेंगे ...
क्रमशः ........
स्वरोज सुर मंदिर (२).....स्वर ,आरोह-अवरोह
![]() |
| अरुण कमल .. |
आज स्वरोज सुर मंदिर की दूसरी कड़ी लिख रही हूँ |राग यमन का परिचय आपको दिया था |राग यमन सुनते जाइये |आज कुछ मूलभूत बातें आपको बताती हूँ |
सबसे पहले स्वर क्या है ?
नियमित आन्दोलन -संख्या वाली ध्वनी स्वर कहलाती है|यही ध्वनी संगीत के काम आती है ,जो कानो को मधुर लगती है तथा चित्त को प्रसन्न करती है |इस ध्वनी को संगीत की भाषा में नाद कहते हैं |इस आधार पर संगीतोपयोगी नाद 'स्वर'कहलाता है अब आप समझ गए होंगे कि संगीत के स्वर और कोलाहल में फर्क है |और यहाँ संगीत विज्ञान से जुड़ गया है |संगीत में सातों स्वरों के नाम इस प्रकार हैं ....
सा-षडज
रे-रिशब
ग-गंधार
म-मध्यम
प-पंचम
ध-धैवत
नि-निषाद
अब हम आरोह- अवरोह पर आते हैं |जब हम स्वरों को गाते हैं तो स्वरों के चढ़ते हुए क्रम को आरोह कहते हैं | जैसे :
आरोह :सा ,रे, ग,म,,प ,ध,नि ,सं||
उसी तरह उतरते हुए क्रम को अवरोह कहते हैं |जैसे :
अवरोह :सां,नि ,ध ,प,म ,ग ,रे ,सा ||
अलंकार: स्वर स्थान समझने के लिए ..या यूँ कहूं की ये जानने के लिए की सा से रे ,रे से ग ,ग से म क्रमशः स्वरों की दूरी परस्पर कितनी है हमें अलंकारों का अभ्यास करना पड़ता है |जैसे :
आरोह :सारेग ,रेगम ,गमप,मपध ,पधनी ,धनिसां ||
अवरोह :सांनिध ,निधप,धपम ,पमग ,मगरे ,गरेसा ||
संगीत का प्रभाव :
संगीत से केवल आनंदानुभूति ही नहीं होती |ध्वनियाँ मानसिक स्थितियों की भी सूचक होती हैं |साथ ही ये हमारे मनोभावों को भी प्रभावित करतीं हैं |संगीत हमारी आत्मा में भक्तिमय अनुभूतियाँ भर देता है |भक्ति भी एक प्रकार का आवेग है जो हमारी आत्मा को प्रभावित करता है |
संगीत में एक गति है |और हमारी क्रियाएं भी गत्यात्मक हातीं हैं |दोनों में सदृश्य होने के कारण ही मात्र ध्वनिमय राग -रागिनियाँ हमारी आत्मा को प्रभावित कर लेती हैं |जो संगीत हम आत्मसात कर लेते हैं वो ईश्वरीय बन कर सदा सदा ...हमारे पास ..हमारे साथ ही रहता है|प्राकृतिक गति हमें आनंद देती है |बच्चे जन्म से ही इससे प्रभावित हो जाते हैं |राग और लय में प्रभावित करने की शक्ति उनकी नियमितता के कारण ही आती है ,क्योंकि असंतुलन में संतुलन ,अव्यवस्था में व्यवस्था और असामंजस्य में सामंजस्य लेन की अपेक्षा नियमितता या संयम से हम अधिक प्रभावित होते हैं|स्वर और लय का संयम तथा सामंजस्य ही हमें प्रभावित करता है |
संगीत हमें आनंद ही नहीं देता बल्कि एक जीवन शैली भी देता है ..!!
क्रमशः ......
अलंकार: स्वर स्थान समझने के लिए ..या यूँ कहूं की ये जानने के लिए की सा से रे ,रे से ग ,ग से म क्रमशः स्वरों की दूरी परस्पर कितनी है हमें अलंकारों का अभ्यास करना पड़ता है |जैसे :
आरोह :सारेग ,रेगम ,गमप,मपध ,पधनी ,धनिसां ||
अवरोह :सांनिध ,निधप,धपम ,पमग ,मगरे ,गरेसा ||
स्वरों से समूह को ले कर आरोह और अवरोह करते हैं विभिन्न अलंकार |
ये कई प्रकार से किये जा सकते हैं |
संगीत का प्रभाव :
संगीत से केवल आनंदानुभूति ही नहीं होती |ध्वनियाँ मानसिक स्थितियों की भी सूचक होती हैं |साथ ही ये हमारे मनोभावों को भी प्रभावित करतीं हैं |संगीत हमारी आत्मा में भक्तिमय अनुभूतियाँ भर देता है |भक्ति भी एक प्रकार का आवेग है जो हमारी आत्मा को प्रभावित करता है |
संगीत में एक गति है |और हमारी क्रियाएं भी गत्यात्मक हातीं हैं |दोनों में सदृश्य होने के कारण ही मात्र ध्वनिमय राग -रागिनियाँ हमारी आत्मा को प्रभावित कर लेती हैं |जो संगीत हम आत्मसात कर लेते हैं वो ईश्वरीय बन कर सदा सदा ...हमारे पास ..हमारे साथ ही रहता है|प्राकृतिक गति हमें आनंद देती है |बच्चे जन्म से ही इससे प्रभावित हो जाते हैं |राग और लय में प्रभावित करने की शक्ति उनकी नियमितता के कारण ही आती है ,क्योंकि असंतुलन में संतुलन ,अव्यवस्था में व्यवस्था और असामंजस्य में सामंजस्य लेन की अपेक्षा नियमितता या संयम से हम अधिक प्रभावित होते हैं|स्वर और लय का संयम तथा सामंजस्य ही हमें प्रभावित करता है |
संगीत हमें आनंद ही नहीं देता बल्कि एक जीवन शैली भी देता है ..!!
क्रमशः ......
Saturday, September 3, 2011
स्वरोज सुर मंदिर ...(1)
![]() |
| स्वर्गीय श्रीमती सरोज अवस्थी. |
सरू से दूर कमल मुरझाये ...
ईमन यमन राग बिसराए ..
यमन राग मेरी तुमसे है ........
निश्चय ही ........!!!!
मध्यम तीवर सुर लगाऊँ .........
जब लीन मगन मन सुर साधूँ ....
तुममे खो जाऊं ...आरोहन -अवरोहन सम्पूरण ......!!
अब रात्री का प्रथम प्रहर..
हरी भजन में ध्यान लगाऊँ .....!!
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| श्वेत कमल... |
अब मेरी माँ, जिनका नाम श्रीमती सरोज अवस्थी था ,उनके नाम''सरोज '' में, अपने स्वरों को जोड़ कर ,मैंने अपने इस सुर मंदिर का नाम ''स्वरोज सुर मंदिर ''रखा है |माँ तो अब इस दुनियां में नहीं हैं |विदुषी थीं ...संस्कृत की ज्ञाता थीं |हम लोगों से घिरी रहकर ही वो खिली खिली रहती थीं ...!!बिलकुल इसी श्वेत ,स्निग्ध कमल की तरह ....!!-देखिये न ..उसकी परछाईं भी पानी में कितनी साफ़ दिख रही है ...!!ऐसी ही निश्छल -उज्जवल थीं वो ...!!जो कविता मैंने उनपर लिखी है वो उनके पूरे जीवन का निचोड़ ही कहती है ....!!माँ को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ,उन्हें नमन करते हुए मैं इस श्रंखला को प्रारंभ कर रही हूँ |इस श्रंखला में समय समय पर आपको स्वरों से सम्बंधित जानकारी देती रहूंगी |मेरी कोयल को भी धन्यवाद -उससे ऐसा नाता जुड़ा है मेरा .... मैं जहाँ भी जाती हूँ मेरा स्वरोज सुर मंदिर मेरे साथ साथ रहता है हमेशा........! प्रभु की असीम कृपा है |
संध्या दीपक का समय .....शाम सात बजे ...रात्री का प्रथम प्रहर शुरू होता है ....कानो में मुझे तानपुरे की वो अद्भुत नाद सुनाई देती है ......जो ह्रदय के तार झंकृत कर देती है और ...सहज ही मन इश्वर से जोड़ देती है |माँ की याद में संध्या दीपक जलाते हुए आज मैं ''राग यमन'' की चर्चा कर रही हूँ |क्योंकि वो इसी समय का राग है |
संगीत की बातें समझाना बहुत सहज नहीं है |ये एक ऐसी विधा है जो जन्म जन्मान्तर तक हमारे पास ही रहती है |और इसको समझाने के लिए भी लम्बा वक्त चाहिए |मैं उम्मीद करती हूँ आप भी इस विधा से धीरे धीरे वाबस्ता हो जायेंगे |प्रथम परिचय के लिए आज इतना ही काफी है |
आपसे विनती है ....कोई भी जानकारी राग यमन पर आप मेरे साथ बाटना चाहें ....स्वागत है |
A TRIBUTE TO MY MOTHER.
रश्मि दी का आभार ..जिन्होंने मुझे प्रेरित किया ये नया सिर्फ संगीत से सम्बंधित ब्लॉग बनाने के लिए......
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