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Saturday, May 26, 2012

संगीत और आत्मा के सम्बन्ध .....!!

संगीत के विषय में बात  करते  करते  आज मैं आपको संगीत की  शास्त्रीय संगीत के अलावा भी ....अन्यविधाओं के बारे में बताना चाहती हूँ .....


 भावुकता से हीन कोई कैसा भी पषान  ह्रदय क्यों न हो ,किन्तु संगीत विमुख होने का दावा उसका भी नहीं माना जा सकता |कहावत है गाना और रोना सभी को  आता है|संगीत की भाषा मे जिन व्यक्तियों ने अपने विवेक ,अभ्यास और तपश्चर्य के बल से स्वर और ताल पर अपना अधिकार कर लिया है ,उनका विज्ञ समाज में आदर है,उन्हें बड़ा गवैया समझा जाता है |परंतु अधिकांश जन समूह ऐसा होता है ,जो इस ललित कला की साधना और तपस्या से सर्वथा वंचित रह जाता है |ऐसे लोग भले ही घरानेदार गायकी ना करें,किंतु इन लोगों के जीवन का सम्बंध भी संगीत से प्रचुर मात्रा मे होता है |गाँव मे गाये जानेवाले लोकगीतों के विभिन्न प्रकार ,कपड़े धोते समय धोबियों का गीत,भीमकाय पषाणों को ऊपर चढ़ाते समय  श्रमिकों का गाना ,खेतों मे पानी देते समय किसानों द्वारा गाये जाने वाले गीत,पनघट पर ग्रामीण युवतियों के गीत,पशु चराते समय ग्वालों का संगीत,इस कथन की पुष्टि  के लिये यथेष्ट प्रमाण हैं|इस प्रकार के गीत तो दैनिक चर्या मे गाये जाते हैं |किसी विशेष अवसर पर जैसे ....


*शिशु जमोत्सव पर गाये जाने वले सोहर ......
*विवाह उत्सव पर गाये जाने वाले बन्ना-बन्नी
*उलहना और छेड़खानी से भरे दादरे.....


घर-परिवार  का कोइ भी अवसर क्यों ना हो ,इन गीतों और नृत्य  के बिना परिपूर्ण होता ही नहीं  है ।


संगीत मे जादू जैसा असर है ,इस वाक्य को चाहे जिस व्यक्ति के सम्मुख कह दीजिये ,वह स्वीकृती -सूचक उत्तर ही देगा,नकारात्मक नहीं|यद्यपि उसने इस वाक्य को परीक्षा की कसौटी पर कभी नहीं कसा है,तब भी अनुभवहीन होने पर भी सभी इसे क्यों मानलेते  हैं यह एक विचारणीय प्रश्न है ।उसकी यह स्वीकृति
संगीत और आत्मा   के  सम्बन्ध की पुष्टि करती है ।आत्मा सत्य का स्वरुप है ।अतः वह सत्य की सत्ता को तुरंत  स्वीकार  कर लेता है । इसका एक  कारण  संगीत   की व्यापकता  का  रहस्य तथा संगीत के सम्बन्ध में  कुछ सुनी हुई  बातों  का अनुभव भी हो सकता है ।
पावस की लाजवंती संध्याओं को श्वेत-श्याम  मेघ मालाओं से प्रस्फुटित  नन्हीं-नन्हीं बूँदों  का रिमझिम -रिमझिम  राग  सुनते ही कोयल कूक उठाती है ....पपीहे गा उठाते हैं ....मोर नाचने लगते हैं ....मन-मंजीरे  बोल  उ ठते हैं .....।लहलहाते हरे-भरे खेतों को देखकर  कृषक   आ नंद विभोर हो जाता है और अनायास ही अलाप उठता है किसी  परिचित मल्हार के बोल ।यही  वो समय होता है जबकि प्रकृति के कण -कण  में  संगीत की सजीवता भासमान  होती है ।इन  चेतनामय  घड़ियों में  प्रत्येक  जीवधारी पर  संगीत की मादकता का  व्यापक   प्रभाव  पड़ता  है ।


जीवन-पथ  के किसी भी मोड़ पर  रुक कर देख  लीजिये  ,वहीँ आपको  अलग-अलग  विधाओं में  संगीत   मिलेगा ....!!दुःख से सुख से ,रुदन से हास से ,योगसे  वियोग से   ,मृत्यु से  जीवन से  ,जीवन की प्रत्येक  अ वस्था में सगीत  की   कड़ी  ........जुड़ी ही रहती है ......!!!!!


आपके लिए आज  एक  विशेष  अनुभूती लिए हुए सुश्री नगीन तनवीर का गाया ये लोकगीत ......... ज़रूर सुनिए ......



Wednesday, May 16, 2012

संगीत की शक्ति ........(२)


भारतीय संगीत साहित्य में तानसेन से सम्बंधित कई चमत्कारिक किम्वदंतियां हैं ,जिनमे से दीपक राग द्वारा दीपक जला देना ,मेघ द्वारा वृष्टि कराना और स्वर के प्रभाव से हिरन आदि पशुओं को पास बुला लेना मुख्या रूप से प्रचलित है |इसी प्रकार ग्रीक साहित्य में  ऑरफेंस का वर्णन मिलता है ,जो संगीत के प्रभाव से चराचर जगत को हिला देता था ,समुद्र की उत्ताल तरंगों को शांत कर देता था और वायु के वेग को रोक सकता था |
                             मिल्टन ने 'पैराडाईज़ लॉस्ट ' में लिखा है कि जब ईश्वर ने सृष्टि रची,तब उसने पहले संगीत कि शक्ति से बिखरे हुए नकारात्मक तत्वों को एकत्रित किया ,तत्पश्चात सृष्टी की रचना की |ट्राइडन इसी बात को अपने सेंट असीलिया कि प्रार्थना के गीत में दिखता है |वह कहता है कि संगीत में केवल वास्तु के सृजन कि ही नहीं,लय उत्पन्न करने की भी शक्ति है ;जिस प्रकार जगत कि उत्पत्ति संगीत से है ,उसी प्रकार उसका लय भी संगीत  से ही होता है |जैसे संगीत भौतिक तत्वों का समन्वय करता है ,वैसे ही अध्यात्मक तत्वों का भी |स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही सृष्टि संगीत कि शक्ति के अधीन हैं ,इस सत्य को स्टीवेंसन ने भी स्वीकार किया है |उन्होंने अपने एक लेख में बंसी बजाते हुए प्रकृति-देव की कल्पना की है |

शास्त्र के साथ कुछ क्रियात्मक हो तो अपनी बात कि सार्थकता सिद्ध होती है खास तौर पर तब जब संगीत की शक्ति  की बात हो ...!
राग पूरिया कल्याण सुनिए .....
मरवा थाट का राग है ...

Friday, May 11, 2012

धीरे धीरे मचल ...


कभी जब अपनी पहचान ढूंढती हूँ .....एक ही आवाज़ आती है ....
मेरी आवाज़ ही पहचान है .....गर याद रहे ......!!स्वर आत्मा के साथी हैं ..!कभी साथ नहीं छोड़ते |कोई भी कला हो उसे आत्मा आत्मसात करती है |तभी कहते हैं मनुष्य कुछ मूलभूत चीज़ों के साथ जन्मता है |
        विभिन्न देशों में संगीत के प्रकार चाहे भिन्न भिन्न हों ,परन्तु प्रचार और गुणों का रूपांतर नहीं होता |संगीत का मौलिक रूप और उसके सृजनात्मक तत्त्व सभी स्थानों के संगीत में समान होते हैं |संगीत के परमाणुओं में मानव की वृत्तियों को प्रशस्त करने के साथ-साथ आत्मिक शक्ति भी निहित है |चारित्रिक उत्थान का  सर्वोत्तम साधन भी संगीत ही है |इस ललित कला  की गहराई मापी नहीं जा सकती |


ये तो हुईं कुछ शास्त्र की बातें ....अब ....
हमारी फिल्मों में भी कुछ ऐसे नायब नगमे हैं जिनको सुन कर झूम उठता है मन ....!

 आप सभी को , अनुपमा फिल्म का ....आज मैं अपना पसंदीदा गीत सुनाना चाहती हूँ ....
  ...धीरे धीरे मचल ...





Sunday, May 6, 2012

संगीत की शक्ति .....(१)

ज्ञान विज्ञानं से परिपूर्ण मानव जगत में नित नए प्रयोग हो रहे हैं |जब ये प्रयोग जीवन के विभिन्न अंग बन जाते हैं ,तब मानव फिर अभिनव अनुसन्धान में प्रवृत्त हो जाता है |यद्यपि संगीत स्वयं एक विज्ञानं है ,किन्तु अभी इसकी सिद्धी के लिए वर्षों की तपस्या अपेक्षित है |इधर कुछ समय से वैज्ञानिकों का ध्यान संगीत की ओर गया है ,किन्तु संगीत के क्रियात्मक ज्ञान के आभाव के कारण हर वैज्ञानिक इस ओर ध्यान नहीं दे सकता 
               संसार परमाणु की सत्ता स्वीकार कर चुका है और नाद के गुण से भी वो परिचित है |किन्तु नाद कि विलक्षण शक्ति अभी  अप्रकट है |जिस दिन वो प्रकट हो जायेगी ,संसार एकमत से संगीत को सर्वोपरि विज्ञानं स्वीकार कर लेगा |अणु और परमाणु का अस्तित्व उसके समक्ष नगण्य हो जायेगा |प्राचीन काल में ध्वनि के भौतिक प्रभाव  पर जो प्रयोग किये गए थे ,वे आज केवल किंवदंती  के रूप में अवशिष्ट हैं |किन्तु जो भी उन किंवदंतियों सुनता है ,वह भविष्य में उनकी सफलता के लिए आज के वैज्ञानिक उत्कर्ष को देख कर आस्थावान हो जाता है |हमारे प्राचीन आचार्य और महर्षियों ने हाइड्रोजन बम निश्चय ही नहीं बनाये थे ,किन्तु ध्वनि  विज्ञानं पर उन्होंने जो विचार व्यक्त किये थे,वे आज भी कसौटी पर खरे उतरते हैं |नाद की शक्ति पर विवेचन करने वाले अनेक ग्रन्थ आज लुप्त हैं |
                                             विज्ञानं द्वारा ये सिद्ध हो गया है कि द्रव्य (मैटर )और शक्ति (एनर्जी ),ये दोनों एक ही वस्तु हैं |मैटर को एनर्जी और एनर्जी को मैटर में परिवर्तित किया जा सकता है ,अर्थात परम तत्व एक ही है |अतः शब्द का प्रभाव बड़ा विलक्षण है |जिस प्रकार मिटटी का गुण 'गंध ' और अग्नि का गुण 'उष्णता ' है ,उसी प्रकार आकाश का गुण 'शब्द 'है |वह सदा आकाश में विद्यमान  रहता है ।इस सत्य को जान  लेने पर कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि वे शीघ्र ही किसी उपकरण की सहायता से तानसेन का गायन और भगवन श्री कृष्ण के मुख से कही गई गीता को आकाश से ग्रहण कर उन्हीं की आवाज़ में सुनवा सकेंगे ।






                                                                                                                        क्रमशः .........

Sunday, April 29, 2012

भारतीय संगीत कला की उत्पत्ति ......!!

भारतीय संगीत कला की उत्पत्ति कब और कैसे हुई इस विषय पर विद्वानों के विभिन्न मत हैं  जिनमे कुछ इस प्रकार हैं :
संगीत की उत्पत्ति आरंभ में वेदों के निर्माता ब्रह्मा द्वारा हुई |ब्रह्मा ने यह कला शिव को दी और शिव जी के द्वारा सरस्वती  जी को प्राप्त हुई |सरस्वती जी को इसीलिए 'वीणा पुस्तक धारिणी 'कहकर संगीत और साहित्य की अधिष्ठात्री माना  गया है |सरस्वती जी से संगीत कला का ज्ञान नारद जी को प्राप्त हुआ |नारद जी ने स्वर्ग के गन्धर्व ,किन्नर और अप्सराओं को संगीत शिक्षा दी|पृथ्वी  पर ऋषिओं ,जैसे भरत मुनि 
के माध्यम से संगीत कला आई |
                                'संगीत-दर्पण' के लेखक  दामोदर पंडित  पंडित सन-१६२५ई .के मतानुसार ,संगीत की उत्पत्ति ब्रह्मा से ही हुई |भरत मुनि ने महादेव के सामने जिसका प्रयोग किया ,वो मुक्ति दायक मार्गी संगीत कहलाता है |
 फारसी के एक विद्वान का मत है कि हज़रात मूसा जब पहाड़ों पर घूम घूम कर वहाँ की छटा देख रहे थे ,उसी वक्त गैब ,आकाशवाणी हुई कि 'या मूसा हकीकी,तू अपना असा (एक प्रकार का डंडा ,जो फकीरों के पास होता है )इस पत्थर पर मार !' यह आवाज़ सुनकर हज़रात मूसा ने अपना असा जोर से उस पत्थर पर मारा ,तो पत्थर के सात टुकड़े हो गए और हर एक टुकड़े में से पानी की अलग अलग धार बहने लगी |उसी जल धारा की आवाज़ से अस्सामलेक हज़रात मूसा ने सात स्वरों की रचना की |जिन्हें सा,रे,ग,म,प,ध ,नी कहते हैं |


पाश्चात्य विद्वान फ्रायड के मतानुसार ,संगीत कि उत्पत्ति एक शिशु के समान ,मनोविज्ञान के आधार पर हुई |जिस प्रकार बालक रोना,चिल्लाना,हंसना अदि क्रियाएँ आवश्यकतानुसार स्वयं सीख जाता है ,उसी प्रकार मानव में संगीत का प्रादुर्भाव मनोविज्ञान के अधर पर स्वयं हुआ |
               इस प्रकार संगीत कि उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मत पाए जाते हैं |

Saturday, April 14, 2012

वाद्यवृन्द या वृंदवादन ...!

                                                       

                                                           वाद्यवृन्द  या वृंदवादन ...!


इसे अंग्रेजी में ऑर्केस्ट्रा कहते है ।दक्षिण में इसे वाद्य कचहरी कहा जाता है ।पाणिनि -काल में वाद्यवृन्द के लिए 'तूर्य' शब्द का प्रयोग किया जाता था ।उसमे भाग लेने वाले तूर्यांग कहलाते  थे ।मुग़ल काल में नौबत कहते थे ।
वाद्यवृन्द में शास्त्रीय,अर्धशास्त्रीय तथा लोकधुनो पर आधारित रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।आधुनिक वाद्यवृन्द की शुरुआत अठारवीं सदी के अंत से मानी जाती है ।विदेशों में ऑर्केस्ट्रा शब्द का प्रयोग सत्रहवीं शताब्दी से शुरू हुआ जिसे symphony कहा जाने लगा ।इसमें कई वाद्य मिलकर रचना को प्रस्तुत करते हैं जिसके द्वारा भिन्न भिन्न भावों की सृष्टी की जाती है ।इसके प्रस्तुतीकरण में ऐसा लगता है मानो  वाद्यों की कोई गाथा  प्रस्तुत की जा रही हो ।
    वर्त्तमान में वाद्यावृन्दा के विकास में उस्ताद अल्लाउद्दीन  खान ,'स्ट्रिंग "नमक प्रथम भारतीय 'मैहर -बैंड ' के संस्थापक ,विष्णुदास शिरली,पंडित रविशंकर,लालमणि मिश्र ,जुबिन मेहता ,तिमिर्बरण,अनिल बिस्वास ,पन्नालाल घोष,टी .के .जैराम  अय्यर ,विजयराघव राव और आनंदशंकर ने बहुत योगदान दिया है ।
वाद्यवृन्द और ऑर्केस्ट्रा वाद्यों की एक ऐसी भाषा है जो एकता और सामाजिक भावना का सन्देश देती है ।

Sunday, April 8, 2012

tabla ...झपताल

                                                      झपताल 

इसमें दस मात्राएँ होतीं हैं ।२-३-२-३ मात्र के चार विभाग होते  हैं ।इसके बोल हैं ....
धी  ना ।धी  धी   ना ।ती  ना ।धी  धी  ना .
X          2                 0         3

1,3,8 पर ताली   और  छटवीं मात्र खाली ।

संगीत क्रियात्मक शास्त्र है इसलिए ये बहुत सुंदर झपताल पर कुछ ऐसी सामग्री मिली ,सोचा आपको बताऊँ ।झपताल क्या है कुछ तो समझ आइयेगा ही ।